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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/३७९

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३७२ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह होता। भोजन कम हो और खानेवाले ज्यादा हो जाये तो थोडा देकर सबका सतोष कराना भी मेरा ही कर्तव्य होता । बहनोके सामने में थोडा खाना रखता तो क्षणभर मेरी ओर डाटनेकी निगाहसे देखती और फिर मेरी स्थिति समझकर हँसते हुए चल देती। वह हृदय मुझे जिदगीभर भूलनेका नहीं। मै कह देता कि मै लाचार हूँ । मेरे पास पका हुआ भोजन थोडा है और खानेवाले बहुत है । इसलिए मुझको उतना ही देना होगा कि सभी को थोडा-थोडा मिल जाय । इसपर वे स्थितिको समझ जाती और 'सन्तोपम्' कहकर हँसते हुए चल देती । 7 ये सब तो मधुर स्मरण हुए । कडवे स्मरण ये है कि लोगोको थोडी फुरसत मिली तो उसका उपयोग आपसके झगडे-टंटमें होने लगा। इससे भी बुरी बात यह हुई कि व्यभिचारकी घटनाएं हुईं। स्त्री पुरुपोको साथ तो रखना ही पडता । भीड भी वैसी ही थी, व्यभिचारीको शर्म क्यों आने लगी? ये घटनाएं ज्योंही घटित हुईं मैं मौकेपर जा पहुचा । अपराधी शर्माये । उनको अलग रखा। पर जो मेरे कानतक नही पहुची,' ऐसी घटनाए कितनी हुई होंगी, यह कौन कह सकता है इस विपयका अधिक विस्तारसे वर्णन करना बेकार है । इतना यह जतानेके लिए लिख दिया कि सब कुछ आसान नहीं था और ऐसी घटनाएं घटित हुई तब भी किसीने मेरे साथ उजड्डपन- का बरताव नही किया। नीति-अनीतिका भेद अधिक न जानने- चाले जंगली जैसे लोग भी अच्छे वातावरणमे कैसे सीधे चलते है, इसे मैने अनेक अवसरोपर देख लिया है और इसे जान aar अधिक araश्यक और लाभदायक है ।