ट्रांसवालमें प्रवेश-१ ३७३ । १६ । ट्रांसवालमें प्रवेश -१ अब हम १९१३ के नवंबर महीनेके आरंभ है । कच करनेके पहले दो घटनाओका उल्लेख कर देना उचित होगा । न्यूकैसेलमे द्राविड़ वहनोको जेलकी सजा मिली तो डर्वनकी वाई फातिमा महतावसे न रहा गया । इसलिए वह भी अपनी मा हनीफा वार्ड और ७वरसके लड़के के साथ जेल जानेको निकल पड़ी। मां-बेटी तो पकड़ की गई, पर वेटेको गिरफ्तार करनेसे सरकारने साफ इन्कार कर दिया । पुलिसने फातिमा वाईकी उंगलियोकी निशानी लेनेकी कोशिश की, पर वह निडर रही और उगलियोंकी निशानी नही दी । इस वक्त हडताल पूरे जोरमें चल रही थी। उसमें पुरुषोकी तरह स्त्रियां भी आकर शामिल हो रही थी। दो स्त्रियोंकी गोदमें बच्चे थे । एक बच्चेको कूचमे सर्दी लग गई और वह मौतकी गोदमे चला गया। दूसरा बच्चा एक नालेको लांघते हुए माकी गोदसे गिर गया और प्रवाहमे बहकर डूब गया; पर वीर माताने दिल छोटा नही किया । दोनोने कच जारी रखी । एकने कहा - "हम मरे हुमोका शोक करके क्या करेगी ? वे कही लौटकर आ सकते है ? जीवितोकी सेवा करना हमारा धर्म है ।" ऐसी शांत वीरता, ईश्वरमे ऐसी ढ- आस्था, ऐसे ज्ञानकी मिसाले गरीवोमे मुझे अकसर मिली हैं। ऐसी ही दृढतासे चार्ल्सटाउनमें स्त्री-पुरुष अपने कठिन धर्मका पालन कर रहे थे । पर हम यहां कुछ शांतिके लिए नही आये थे। शांति जिसे दरकार हो वह उसे अपने अंतरमें प्राप्त करे। बाहर तो जहां देखो और देखना आता हो तो "यहां शांति नही मिलती" की ही तक्तिया लगी दिखाई देगी ।
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