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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/३९४

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सभी केंद १८७ नाईसे उन्हें समझा सके कि उनकी तो मुराद ही जेल जाना है और जब सरकार गिरफ्तार करनेको तैयार है तो हमे उसके म्यौतेका स्वागत करना चाहिए। इसमें हमारी सज्जनता और विजय है। उन्हें समझ लेना चाहिए कि मेरी इच्छा दूसरी हो ही नही सकती । लोग समझ गये और ट्रेनमें सवार हो गये । इधर में फिर मजिस्ट्रेटके सामने पेश किया गया । उस वक्त ऊपरकी घटनाकी मुझे कुछ भी खबर नही थी। मैने फिर अदालतसे मुहलतकी प्रार्थना की। बताया कि दो अदालते मुहलत मंजूर कर चुकी है। यह भी कहा कि हमारी मजिल नव थोड़ी ही बाकी है और प्रार्थना की कि सरकार या तो काफिलेको गिरफ्तार कर ले या मुझे उनको उनके स्थान ट्राल्स्टाय फार्ममे छोड आने दे। अदालतने मेरी प्रार्थना तो स्वीकार नहीं की; पर मेरी दरख्वास्त तुरंत सरकारके पास भेज देना मजूर किया। इस वक्त मुझे बडी ले जाना था । मुझपर असल मुकदमा गिरमिटिया मजदूरोको नेटाल छोड़- कर चले जानेका बहकानेका तो वही चलाया जानेवाला था। मत मुझे उसी दिनकी ट्रेनसे हंडी ले गये । उवर मि० पोलक बालफोरमे गिरफ्तार नही किये गये, वल्कि काफिलेकी गिरफ्तारीमे अधिकारियोको उनसे जो मदद मिली उसके लिए उन्हें धन्यवाद भी दिया गया । मि० चमनीने तो यह भी कहा कि आपको गिरफ्तार करनेका सरकारका इरादा ही नही है । पर यह तो था मि० चमनीका, और जहातक उन्हें मालूम था, सरकारका विचार था, किन्तु सरकारका विचार तो घड़ी-घड़ी बदला करता है। सर- कारने अतमे ते किया कि मि० पोलकको हिंदुस्तान नही जाने देना चाहिए और उनको तथा मि० केलनबेकको, जो खूद काम कर रहे थे, गिरफ्तार कर लेना चाहिए। फलतः