सभी कैव ३५६ कैदकी सजा मिली। हमने सोचा कि ये तीन महीने तो हम साथ रह सकेंगे, पर सरकारका सुभीता इसकी इजाजत नही देता था । इस बीच पोडे दिन हम वोक्सरस्ट जेलमे सुखसे रहे । यहा रोज नये कैदी आते और चाहरकी खवर लाते । इन सत्याग्रही कैदियोमे एक हरवतसिंह नामका बूढा था । उसकी उम्र ७५ से ऊपर थी। वह किसी खानमे काम नही करता था अपना गिरमिट तो वह बरसो पहले पूरा कर चुका था । इसलिए वह हडतालमें शामिल नही था। मेरी गिरफ्तारीके बाद लोगोमें उत्साह वहुत ही बढ गया था और बहुतेरे नेटालसे ट्रास- वालमे दाखिल होकर गिरफ्तार हो रहे थे। हरवर्तासह भी उन्होने था। मैने उससे पूछा- "आप जेलमे गयो जाये ? आप जैसे बुढोको मैने जेलमे आनेका निमंत्रण नही दिया हूँ ?" हरवतसिहने जवाब दिया- "मे कैसे रह सकता था, जब आप, आपकी धर्मपत्नी और आपके लड़के तक हम लोगोके लिए जेल चले गये ?" "लेकिन आपसे जेलके दुःख बर्दाश्त नही हो सकेगे । आपके छूटनेके लिए में कोशिश करूं ? " "मैं हरगिज जेल नही छोड़गा। मुझे एक दिन तो मरना है हो। फिर ऐसा दिन कहां, जो मेरी मौत यहां हो जाय ! " झुक इस दृढताको में कैसे डिगाता ? वह डिगाए डिगती भी नहीं । मेरा सिर इस निरक्षर ज्ञानीके सामने गया | जैसी हरवतसिंहकी भावना थी वैसा ही हुआ । हरवत- सिंहकी मृत्यु जेलमें हुई । उसका शव बोक्सरस्टसे डर्वन मंगाया गंग और सैकडों भारतीयोकी उपस्थितिमें उसका शम्मानपूर्वक अग्निसंस्कार किया गया। ऐसे हरवतसह इस लड़ाईमे एक ही नही, अनेक थे। पर जेलमें मरनेका सौभाग्य
पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/३९६
दिखावट