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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/३९७

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३६० दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह केवल अकेले उसीको मिला। इससे दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रहके इतिहासमे वह उल्लेखका अधिकारी हो गया । इस प्रकार लोग आकृष्ट होकर जेल आयें यह सरकारको पसंद नही हो सकता था। फिर जेलसे छूटनेवाले मेरा सदेसा ले जाय यह भी उसको गवारा नही हो सकता था । बत. हम तीनोको अलग कर देने, एकको भी बोक्सरस्टमे न रहने देने और मुझे ऐसी जेलमे ले जानेका निश्चय किया गया जहा कोई हिंदुस्तानी जा ही न सके न फैलते में आरेजियाकी राजधानी ब्लम फोनटोनको जेल भेजा गया । आरजियामे कुल मिलाकर ५० से अधिक हिंदुस्तानी नही थे । वे सभी होटलोमे नौकरी करते थे। ऐसे प्रदेशकी जेलमें हिंदुस्तानी कैदी हो ही नही सकते थे। उस जेल में अकेला ही हिंदुस्तानी था । वाकीके सभी कैदी गोरे या हवशी थे । मुझे इसका दुख नही था, बल्कि मैने इसको सुख माना । मुझे न कुछ सुनना था, न देखना | नया अनुभव मिले यह मेरे मनको भानेवाली बात थी। फिर मुझे पढनेका समय तो बरसोंसे, कहिये १८९३ के बादसे, मिला ही नही था। अब एक बरस मिलेगा यह जान- कर मुझे तो खूनी हुई । में ब्लूम फोनटीन पहुचाया गया । वहा एकांत तो यथेच्छ मिला । कठिनाइयां भी बहुत थी, पर सभी सहा थी। उनका वर्णन करके पाठकोका समय नहीं लूंगा । फिर भी इतना बता देना जरूरी है कि वहाका डाक्टर मेरा मित्र हो गया । जेलर तो केवल अपने अधिकारको ही समझता था, पर डाक्टर कैदियोके हकको रक्षाका ध्यान रखता था । मेरा यह काल शुद्ध फलाहारका था । न दूध लेता, न घी । अन्न भी न खाता । केले, टमाटर, कच्ची मूगफली, नीबू और जैतूनका तेल, बस यही मेरी खूराक थी। इनमें एक भी चीज राडी आये तो भूखों मरना पडता । इसलिए डाक्टर खास