४०२ afhण अफ्रीकाका सत्याग्रह दूसरी प्रार्थना यह है कि सभी सत्याग्रही कैदी छोड दिये जाए। यह न होने से हमारा अपना जेलके बाहर रहना कठिन हो जायगा । अव उन्हें जेल में बंद रखनेका कोई कारण नही है । तीसरे अगर हमें कमीशन के सामने गवाही देनी है तो हमें खानोंमें और जहा जहा गिरमिटिए काम करते है वहा- वहां जाने की आजादी होनी चाहिए। हमारी ये प्रार्थनाए स्वीकार न की गईं तो हमें खेदके साथ फिर जेल जानेके उपाय ढूढने होगे ।" जनरल महोदयने कमीशनमे और किसीको लेनेसे इन्कार किया और कहा कि कमीशन किसी पक्षके लिए नही नियुक्त हुआ है । वह केवल सरकारके सतोषके लिए बनाया गया है। यह जवाब मिलनेपर हमारे पास एक ही इलाज रह गया और हमने जेलकी तैयारी करके यह विज्ञप्ति निकाली कि १९१४ की पहली जनवरीको जेल जानेवालोंकी उनसे कूच शुरू होगी । १८ दिसवर (१९९३) को हम छोडे गये थे, २१ को हमने उपर्युक्त पत्र लिखा और २४ को जनरल स्मट्सका जवाब मिला । पर इस उत्तरमे एक बात ऐसी थी जिससे मैने जनरल स्मट्सको फिर पत्र लिखा । उनके जवावमें इस आशयका वाक्य था - "कमीशन निष्पक्ष और अदालती बनाया गया है, और उसकी नियुक्ति करते समय अगर भारतीयोसे मशविरा नही किया गया तो खानवालो और शक्कर वालोसे भी नहीं किया गया ।" इस वाक्यको देखकर मेने जनरल महोदयको निजी पत्रमें लिखा कि अगर सरकार न्याय ही करना चाहती हो तो मुझे आपसे मिलना है और कुछ तथ्य आपके सामने रखने हैं ।" इसके जवानमे जनरल स्मट्सने मुलाकातका अनुरोध स्वीकार किया। इससे कूच कुछ दिनके लिए तो मुलतवी हो ही गईं।
पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/४०९
दिखावट