अंतका प्रारंभ 1 xo धन्यवादका तार भेजा । दक्षिण अफ्रीकाके अग्रेज मित्रोने भी धन्यवाद दिया । जनरल स्मट्सके एक मंत्रीने मजाकमे कहा- "मुझे तो आपके लोग तनिक भी नही भाते मे उनकी जरा भी मदद करना नही चाहता । पर उनका हम करें क्या ? आप लोग हमारे संकटकालमें हमारी सहायता करते है । हम आपको कैसे मारें ? में तो बहुत बार चाहता हूं कि आप लोग भी अंग्रेज हड़तालियोंकी तरह दंगा-फसाद करें। तब हम तुरंत सीधा कर दे। आप तो दुश्मनको भी हु.ल देना नही चाहते। आप तो स्वयं दुख सहकर विजय प्राप्त करना चाहते है । भलमनसी और शिष्टताकी मर्यादाका कभी उल्लधन नही करते। यहां हम लाचार हो जाते है ।" इसी तरहके भाव जनरल स्मट्सने भी प्रकट किये । पाठकोंको मालूम होना चाहिए कि सत्याग्रहीके सौजन्य और विनयका यह पहला उदाहरण नहीं था। जब वायव्य कोणके हिंदुस्तानी मजदूरीने हडताल की तो बहुत-सी ईख जो काटी जा चुकी थी, ठिकाने कारखाने में नहीं पहुंच जाती तो मालिकोको भारी नुकसान उठाना पड़ता। इसलिए १२०० भारतीय मजदूर उस कामको पूरा करनेके लिए कामपर वापस गये और उसके पूरा हो जानेपर ही अपने साथियोंके साथ शामिल हुए। फिर जब दर्बन म्युनिसिपैलिटीके गिर- मिटियोंने हड़ताल की तो उसमें भी जो लोग भंगीका और अस्पतालका काम करते थे वे वापस भेजे गये और वे खुशीसे अपने कामोपर लौट गये । भगी और अस्पतालके काम करने- वाले अपना काम छोड दे तो शहरमे बीमारी फैलती और रोगियोंकी सेवा-शुश्रूषा न हो पाती । सत्याग्रही ऐसे परि- णामकी इच्छा नही कर सकता। इसलिए ऐसे कर्मचारी हड़तालसे अलग रखे गये । सत्याग्रही जो भी कदम उठाये उसमें उसे विरोधीकी हिम्मतका विचार कर ही लेना चाहिए।
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