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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/४२

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दक्षिण कोकामें भारतीयोका आगमन ३५ उनमेसे एक व्यापारी स्वर्गीय सेठ अबूवकर आमदने नेटालमे दुकान खोलने का इरादा किया। इस वक्त नेटालके अग्रेजोका हिदुस्तानी व्यापारी क्या कर सकते है, इसका पता नही था, इसकी परवा भी नहीं थी । गिरमिटियोकी मददसे वे इंख, चाय, कहवे वगरहकी नफा देनेवाली फसल उपजा सके । ईखकी शकर बनाकर इतने थोडे समयमें छोटे पैमानेपर दक्षिण अफ्रीकाको ये शकर, चाय और कहवा देने लगे कि देखकर अचरज हो । अपनी कमाईसे उन्होने महल खड़े किये ओर सचमुच जंगलमे मंगल कर दिया। ऐसे समय सेठ अबूबकर - सरीखा अच्छा, मला और चतुर व्यापारी उनके बीचमें जा बसे तो यह उन्हे क्यो न खटकता फिर इनके साथ तो एक अग्रेज भी साथी हो गया ! सेठ अबूबकरने अपना व्यापार चलाया, जमीन खरीदी और उनके अच्छा पैसा कमानेकी खबर उनके वतन पोरबंदर और उसके आस- पासके गांवोमे फैली। फलत. दूसरे मेमन नेटाल पहुंचे । उनके पीछे सूरतकी ओरके वोहरें भी पहुंचे। उन्हे मुनीम तो चाहिए ही । मतः गुजरात, काठियावाड़के हिंदू मुनीम भी वहां पहुचे । इस प्रकार नेटालमे दो वर्गके हिंदुस्तानी बसे : १. स्वतंत्र व्यापारी और उनके स्वतंत्र कर्मचारी बोर २. गिरमिटिया । कुछ दिनोमे गिरमिटियों के बाल-बच्चे हुए । गिरमिटके कानूनके अनुसार उनकी सतान यद्यपि मजदूरी करनेके लिए बंधी नही थी, फिर भी इस कानूनको कुछ कठोर धाराओंोंके अधीन तो थी हो । गुलामीका दाग गुलामकी औलादको लगे बिना कैसे रहता ? ये गिरमिटिया पाच वरसके इकरारपर जाते थे। पांच साल पूरे हो जानेपर वे मजदूरी करनेको बधे नही थे । उन्हें खुली मजदूरी या व्यापार करना और नेटालमें स्थायी रूपसे वसना हो तो इसका उन्हें हक था । कुछने इस अधिकार-