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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/४२०

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पत्र-व्यवहार ४१३ उठा सके क्षमा वीरस्य भूषणम् वाक्य ऐसे ही अनुभवके आधारपर लिखा गया है। सत्याग्रहमें निर्भयता रहनी ही चाहिए। फिर निर्भयको भय क्या ? और जहां विरोधीका विरोध जीतना है, उसका नाश नही करना है, वहां अविश्वास कैसा ? इस तरह कौमके समझौता स्वीकार कर लेनेके बाद हमे महज यूनियन पालमेिंट के बैठनेकी राहभर देखनी बाकी रही। इस बीच पूर्वोक्त कमीशनका काम जारी था। हिंदुस्ता- नियोंकी ओरसे बहुत ही कम गवाह उसके सामने गये । उस वक्त कौमपर सत्याग्रहियोंका कितना ज्यादा असर था इसका अकाट्य प्रमाण इससे मिल गया । सर बेंजामिन राबर्टसनने भी हिंदुस्तानियो को गवाही देनेके लिए समझाया; पर लडाईके कट्टर विरोधी थोडेसे भारतीयोके सिवा और सब लोग अवि- चल रहे । इस वहिष्कारका असर तनिक भी बुरा नही हुआ । कमीशनका काम मुख्तसर हो गया और रिपोर्ट झटपट प्रकाशित हो गई। रिपोटर्स कमीशन के सदस्योंने भारतीय जनताके कमीशनके 'काममें सहायता न करनेकी अवश्य कड़ी आलोचना की थी। सैनिकोंके दुर्व्यवहारके आरोपको उड़ा दिया, पर कोमको जो-जो चीज चाहिए थी उस सबको देनेकी सिफारिश कमीशनने की। यानी उसने तीन पौडका कर उठा देने, ब्याहके विषय में हिंदुस्तानियोंकी मांग मंजूर करने और दूसरी अनेक छोटी-मोटी रियायत देने और सारा काम बिना ढिलाई किये करनेकी सिफारिग की। इस तरह कमीशनकी रिपोर्ट जैसा कि जनरल स्मटसने कहा भारतीयों के अनुकूल निकली मि० एंड्रजने विलायत जानेके लिए विदा ली। सर बेंजामिन राबर्टसन भी रवाना हो गये । हमे यह आश्वा- सन दिया गया था कि कमीशनकी रिपोर्टके अनुसार कानून वनाया जायगा । यह कानून क्या था, इसपर अगले प्रकरणम विचार करूंगा ।