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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/४२५

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४१८. दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह ग्रहमे ऐसी विशेषता तो है ही नही कि सत्यसे मिली हुईं वस्तु सत्यका त्याग कर देनेपर भी बनाये रखी जा सके । ऐसा परिणाम हो सकता हो तो वह इष्ट भी नही समझा जायगा । अत अगर दक्षिण अफ्रीकाके भारतीयोंकी स्थिति आज दुर्बल है तो हमे समझ लेना चाहिए कि इसका कारण सत्याग्रहियोंका अभाव है । यह कथन दक्षिण अफ्रीकाके आजके भारतीयोंके दोषका सूचक नहीं है, बल्कि वहाकी वस्तुस्थिति बताता है । व्यक्ति या समुदाय, जो चीज अपने आपमें नही है, वह कहासे लायेगा ? सत्याग्रही सेवक एकके बाद एक इस दुनियासे कूच कर गये । सोराबजी काछलिया, नायडू, पारसी रुस्तमजी, इत्यादिके स्वर्गवाससे सत्याग्रहके अनुभवियोमेसे थोडे ही बच रहे हे । जो रह गये हैं वे आज भी जूझ रहे हैं । अंतमें इन प्रकरणों को पढ जानेवाले इतना तो समझ ही गये होगे कि अगर यह संग्राम नही किया होता और बहुतेरे भारतीयाने जो कष्ट सहे वे न सहे गये होते तो आज दक्षिण अफ्रीका में हिंदुस्तानियों के कदम ही न रह गये होते। इतना ही नही, दक्षिण अफ्रीकामें भारतीयोंकी विजयसे दूसरे ब्रिटिश उपनिवेशोंके हिंदुस्तानी भी कमोबेश बच गये । कुछ न बच सके तो यह दोष सत्याग्रहका नही है, बल्कि इससे साबित हो गया कि उन उपनिवेशोंमें सत्याग्रहका अभाव है और हिंदुस्तानमें उनकी रक्षा करनेकी शक्ति ही नहीं है। सत्याग्रह अमूल्य शस्त्र है, उसमे नैराश्य या हारके लिए अवकाश नहीं, यह बात अगर इस इतिहासमें थोडे बहुत अशमें भी सिद्ध हो सकी हो तो में अपने आपको कृतार्थ समभूगा । समाप्त