मुसीबतोका सिंहावलोकन - १ । ३६ जब नौकरीके बंधन से मुक्त हुए तब कोई-न-कोई छोटा-मोटा धंधा करने लग गये। इससे कुल मिलाकर तो नेटाल-जैसे देशमें बसनेवालोको लाभ ही हुआ । अनेक प्रकारकी साग- सब्जिया जो कुशल किसानोके अभाव के कारण अवतक पैदा नही होती थी अब उपजने लगी। जो चीजे जहां-तहां थोड़ी- बहुत उपजती थी वे अव अधिक मात्रामे मिलने लगी । इससे साग-सब्जीका भाव एकवारगी गिर गया । पर यह बात पैसेवाले गोरोको न रुची । उन्होंने सोचा कि आजतक जिस चीजको हम अपना इजारा' मानते थे उसमे अव हिस्सा वटाने- वाले पैदा हो गए। इससे इन गरीब गिरमिटियोके विरुद्ध आंदोलन आरंभ हुआ । पाठकोंको यह जानकर अचरज होगा कि गोरे एक बोर तो ज्यादा-से-ज्यादा मजदूर मांग रहे थे, हिंदुस्तानसे जितने गिरमिटिया आते वे तुरंत खप जाते, और दूसरी ओर जो मजदूर गिरमिटसे मुक्त होते जाते उनपर तरह-तरहके अकुश रखनेके लिए आदोलन चल रहा था । यह था उनकी होशियारी और जीतोड़ मेहनतका मुआवजा ! आंदोलनने कितने ही रूप धारण किये। एक पक्षने यह मांग पेश की कि जो गिरमिटिया गिरमिटसे मुक्त हो चुके है वे हिंदुस्तान लौटा दिए जाय और पुराना इकरारनामा बदलकर नये इकरारनामेमे नये आनेवाले मजदूरोसे यह शर्त लिखा ली जाय कि गिरमिटसे मुक्त होनेपर वे या तो हिंदुस्तान लौट जाएगे या फिरसे गिरमिटमे दाखिल हो जाएगे। दूसरे पक्षने यह मत प्रकट किया कि गिरमिटसे छुटकारा पानेपर ये नया इकरारनामा लिखना पसद न करे तो उनसे भारी वार्षिक 'व्यक्ति कर लिया जाय । दोनो दलोका मतलब तो एक ही था कि जैसे भी हो गिरमिटियावगं किसी भी दशामे नेटाल- 'एकाधिकार ।
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