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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/४८

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मुसीबतोंका सिहावलोकन --१ ४१ देह सरकारकी ओरसे हिंदुस्तानकी सरकारसे मशवरा करनेके लिए राजदूत भेजे गए । उनकी मांग यह थी कि हर एक गिरमिट मुक्त हिंदुस्तानीपर २५ पौड यानी ३७५) रु० का वार्षिक व्यक्ति कर लगाया जाय। इसके मानी यह होते थे कि कोई भी हिदुस्तानी मजदूर यह कर अदा न कर सके और फलतः आजाद होकर नेटालमे न रह सके । तत्कालीन वाइसराय लार्ड एल्गिनको यह प्रस्ताव बहुत भारी लगा बोर अंतमें उन्होंने ३ पोडका वार्षिक व्यक्ति-कर मंजूर किया । गिरमिटियाकी कमाईके हिसाबसे तीन पोडके मानी उसकी लगभग दो महीनेकी कमाई होते थे। यह कर केवल मजदूरपर ही नहीं था । उसकी स्त्री, तेरह वरससे ऊपरकी लड़की और सोलहसे ऊपरके लडकेको भी देना था । ऐसा मजदूर शायद ही हो जिसके स्त्री और दो बच्चे न हों। अतः मोटे हिसाबसे हर मजदूरको १२ पौड वार्षिक कर अदा करना था। यह कर कितना कष्टदायक हो गया, इसका वर्णन नही हो सकता। उस दुःखको केवल वही जान सकता है जिसने उसका अनुभव किया हो, या थोड़ा बहुत वह समझ सकता है जिसने उसे अपनी मांसों देखा हो। नेटाल सरकारके इस कार्यका भारतीय जनताने कसकर विरोध किया | वही (ब्रिटिश) और भारत सरकारके पास अनियां भेजी गई । पर इस आंदोलनका नतीजा इससे अधिक और कुछ न निकला कि २५ के ३ पोड हो गए। गिरमिटिया बेचारे खुद तो इस मामलेमे क्या कर सकते थे ? आंदोलन तो महज हिंदुस्तानी व्यापारीवर्गाने देशके ददंसे कहिये या परार्थं दृष्टिसे किया था । जो सलक गिरमिटियोके साथ किया गया वही स्वतंत्र भारतीयोंके साथ भी हुआ । नेटालके गोरे व्यापारियोने उनके खिलाफ भी मुख्यत. इन्ही कारणोसे आंदोलन चलाया। हिंदुस्तानी व्यापारी अच्छी तरह जम गए थे। उन्होंने नगरक अच्छे