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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/४९

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જર્ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह भागोमे जमीने खरीद ली थी। गिरमिटसे छूटे हुए हिंदुस्ता- नियोकी आबादी ज्योज्यो वढती गई त्यो त्यो उनको दरकार होनेवाली चीजोकी खपत अच्छी होने लगी। हजारो बोरा चावल हिंदुस्तानस आता और अच्छे नफेपर बिकता । यह व्यापार अधिकाशमे और स्वभावत हिंदुस्तानियो के हाथमे रहा। उधर हवशियो के साथ होनेवाले व्यापारमे भी उनका हिस्सा अच्छा खासा हो गया। छोटे गोरे व्यापारियोस यह देखा न गया। इसके सिवा इन व्यापारियोको कुछ अग्रेजोने ही यह बताया कि कानून के अनुसार उन्हें नेटालकी धारा सभाके सदस्य होने और चुननेका हक है। मताधिकारियोकी सूचीमे कुछ नाम भी दर्ज कराये थे । नेटालके राजकाजी गोरे इस स्थितिको न सह सके। उन्हें यह चिंता हो गई कि यो हिंदुस्तानियो की स्थिति नेटालमे दृढ हो गई और उनकी प्रतिष्ठा बढी तो उनकी प्रतियोगितामें गोरे कैसे टिक सकेगे ? अत नेटालकी जवाबदेह सरकारने स्वतंत्र भारतीयोके बारेमे जो पहला कदम उठाया वह था ऐसा कानून बना देना जिससे एक भी नया हिंदुस्तानी वोटर यो मताधिकारी न हो सके । १८९४ मे इस विषयका पहला बिल नेटालकी धारा सभामे पेश किया गया । इस बिलका मशा था हिंदुस्तानीको हिंदुस्तानीको हैसियतसे वोट देने के हकसे वचित कर देना । यह पहला कानून था जो नेटालमे रग-भेदके आधारपर भारती- योके विरुद्ध बनाया गया । भारतीय जनताने विरोध किया । रातोरात अरजी तैयार हुई । उसपर चार सो आदमियोसे दस्तखत कराये गए । इस अरजीके पहुचते ही धारा सभा चौकी, पर बिल तो पास होकर ही रहा । उन दिनो लार्ड रिपन उपनिवेश सचिव थे। उनके पास अरजी भेजी गई । उसपर दस हजार हस्ताक्षर थे । दस हजार हस्ताक्षरके मानी हुए नेटालमे आजाद हिदुस्तानियोकी लगभग सारी