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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/५६

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मुसीबतोंकर सिंहावलोकन -२ ४६ तो नहीं वजाय ३ पोड लेना तय हुआ और जमीन जो कही भी खरीद और रख न सकनेकी कड़ी शर्त थी उसके बदले यह निश्चय हुआ कि ट्रासवालको सरकार जिस हलके, महल्ले, बाड़ेमें ते कर दे उसीमे हिंदुस्तानी जमीन ले सके। इस दफापर अमल करानेमें भी ट्रासवाल सरकारने दिलमें चोर रखा । अतः ऐसे महल्लोंमे भी जरखरीद जमीन लेनेका हक तो नही ही दिया। हर शहर कसबेमे जहा हिंदुस्तानी बसते थे, य महल्ले नगरसे बहुत दूर और गंदी-से-गदी जगहोमे रखे गए। वहां पानी रोशनीका सुभीता कम-से-कम था, पाखानोंकी सफाईका हाल भी वही था। यानी हम हिंदुस्तानी ट्रांसवालके 'पचम' वन गए और कह सकते है कि इन महलों मोर हिंदुस्तानके मंगी वाडोंमे 'कुछ भी फर्क न था । लगभग यह स्थिति हो गई कि जैसे हिंदू भंगी- चमारको छूने और उनके पड़ोसमे बसनेसे 'अपवित्र' हो जाता है वैसे ही भारतीयके स्पर्श या पड़ोससे गोरा नापाक हो जाता ! फिर इस १८८५ के तीसरे कानूनका ट्रासबालकी सरकारने यह अर्थ किया कि हिंदुस्तानी व्यापार भी इन महलोंमे ही कर सकते है। यह अर्थ सही है या नहीं, इसके निर्णयका अधिकार पचने ट्रासवालको अदालतोको ही दे रखा था । इसलिए भारतीय व्यापारियोंकी स्थिति अति विपन हो गई। फिर भी कही बात चीत चलाकर कही मुकदमे लड़कर, कही सिफारिशसे काम लेकर भारतीय व्यापारी अपनी स्थितिकी रक्षा समुचित रीतिसे कर सके । बोअर युद्ध आरंभ होनेके समय ट्रांसवालमे भारतीयोंकी ऐसी दुखद और अनिश्चित स्थिति थी । अब हम फ्री स्टेटकी दशा देखे। वहां दस-पंद्रहसे अधिक हिंदुस्तानी दुकाने नही खुलवाई थी कि गोरोने नवदंस्त आदोलन उठा दिया । बहाकी धारा समाने चोकसीसे काम करके खतरेकी जड़ ही काट दी। उसने एक कड़ा कानून