५२ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह श्राइतर दक्षिण अफ्रीकाकी लोकप्रिय विदुपी थी और जहा जहां अग्रेजी भाषा बोली जाती है वहा वहा विख्यात थी । मनुष्यमात्रपर उनका प्रेम असीम था । आखोसे जब देखिए प्रेमका भरना ही करता होता । इस वहनने जब 'ड्रीम्स' 1 ( स्वप्न ) नामक पुस्तक लिखी तबसे वह 'ड्रीम्स की लेखिकाके नामसे प्रसिद्ध होगईं। इनकी सरलता इतनी थी कि ऐसे प्रति- ष्ठित और प्रख्यात कुलकी तथा विदुषी होते हुए भी घरके वरतनतक खुद माजा करती थी। श्री मेरीमैन और इन दोनो परिवारोने सदा हमशियोका पक्ष लिया। जब-जब उनके हकपर हमला होता, उनकी जबर्दस्त हिमायत करते । उनके प्रमकी धारा हिन्दुस्तानियो की ओर भी बहती थी, यद्यपि वे सभी हवशी और हिंदुस्तानीमे भेद करते थे । उनकी दलील यह थी कि हवशी दक्षिण अफ्रीका के गोरोके आगमन से पहले के वाणिदे है, इसलिए गोरे उनके स्वाभाविक अधिकारोंको छीन नही सकते, पर हिंदुस्तानियो के बारेमे उनको प्रतियोगिताका खतरा दूर करनेके लिए कोई कानून बनाया जाय तो यह विल- कूल अन्याय नहीं माना जायगा । फिर भी उनकी हमदर्दी हमेशा हिंदुस्तानियो के साथ रहती । स्वर्गीय गोपालकृष्ण- गोखले जब दक्षिण अफ्रीका पधारे तव उनके सम्मानमे वहा जो पहली सभा केप टाउन के टाउनहालमे हुई उसमे श्री श्राइ नरने सभापतिका आसन ग्रहण किया था। श्री मेरीमैनने भी उनके साथ वडे सौजन्य और विनयसे वाते की ओर हिंदु- स्तानियो के साथ हमदर्दी जाहिर की। केप टाउन के अखबारोमे भी और जगहके पत्रोको तुलनामे पक्षपातको मात्रा बहुत कम थी। श्री मेरीमैन आदिके बारेमे मैंने जो कुछ लिखा है वह दूसरे यूरोपियनोके विषयमे भी कहा जा सकता है । यहा तो मैने मिसाल के तौरपर उपर्युक्त सर्वमान्य नाम दे दिये हैं।
पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/५९
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