भारतीयोने क्या किया ?--१ ५७ थी । वैरिस्टरके रूपमे दलालको कमीशन देना जहरसा लगता था । काठियावाड़की साजिशोंमें मेरा दम घुटता था। एक ही बरसके वंधनपर जाना था। मैने सोचा कि मेरे लिए तो इस इकरारनामेमे कुछ भी अड़चन नही है । हानि तो है ही नही क्योकि मेरे जाने-आने और रहनेका खर्च दादा अब्दुल्ला ही देनेवाले थे। इसके अलावा १०५ पौडका मेहनताना भी मिलता। मेरे स्वर्गीय बड़े भाईकी मारफत ये सारी बातें ते हुई थी। मेरे लिए तो वह पिता तुल्य थे। उनकी रजामंदी मेरी रजामंदी थी। उन्हें मेरे दक्षिण अफ्रीका जानेकी बात पसंद आई और १८९३ ई० के मई महीने में डर्बन जा पहुंचा । वैरिस्टरकी बात तो पूछनी ही क्या ? में अपनी समझ के अनुसार वढिया फ्रॉक कोट इत्यादि डाटकर शानसे जहाजसे उतरा। पर उतरते ही मेरी मासे कुछ-कुछ खुल गईं । दादा अब्दुल्लाके जिस साझीके साथ बात हुई थी उसने जो वर्णन मुझे सुनाया था वह तो मुझे उलटा ही दिखाई दिया । इसमे उसका कोई दोष न था । यह था उसका भोलापन, सरलता और परिस्थितिका अन्नान । नेटालमे हिंदुस्तानियो को जो-जो तकलीफे भुगतनी पडती थी उन सबका उसे पता नहीं था। और जिन वर्तावोमे हमारा तीव्र अपमान था वे उन्हें अपमानकारक नहीं जान पड़े थे, पर मेरी आखोने तो पहले ही दिन यह देख लिया कि गोरोंका बर्ताव हमारे साथ बहुत ही अशिष्ट और अपमानकर है । नेटाल पहुंचनेके १५ दिनके अंदर ही कचहरियोंमें मुझे जो कड़वे अनुभव हुए, ट्रेनके अंदर जो कष्ट उठाने रास्तेमे जो मार खाई, होटलमें जगह पानेमें जो कठिनाई हुई, बल्कि जगह पाना लगभग नामुमकिन था — इस सबका वर्णन में यहाँ नहीं करुगा । इतना ही कहगा कि ये सारे अनुभव मेरी रंग-रग में समा गए। में तो सिर्फ एक मुकदमेके लिए गया था,
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