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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/६५

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५५ दक्षिण अफ्रीकाका सत्याग्रह स्वार्थ और तहलकी दृष्टिसे, इसलिए इस पहले वर्षमे तो में इन दुखोंका साक्षी और अनुभवकर्ता मात्र रहा। मेरे धर्मका पालन यहीसे आरभ हुआ। मैने देखा कि स्वार्थ- दृष्टिसे दक्षिण अफ्रीका मेरे लिए बेकार मुल्क है । जहाँ अपमान होता हो वहा रहकर पैसा कमाने या सैर-सपाटा करनेका लोभ मुझे तनिक भी न था । यही नहीं, इससे अत्यन्त अरुचि थी। मेरे सामने धर्मसकट खड़ा हो गया। मेरे सामने दो रास्ते थे । एक यह कि जिस स्थितिको में जान नही सकता था उसे अव जान लिया । इसलिए दादा अब्दुल्लाकै साथ किए हुए इकरारनामेसे छुटकारा प्राप्तकर भाग जाऊ । दूसरा यह कि चाहे जो संकट सहने पडे सह और अगीकृत कामको पूरा करूँ । कहा की ठहमे मारित्सवर्ग स्टेशनपर रेलवे पुलिसके धक्के खाकर, यात्रा स्थगित कर और ट्रेनसे उतरकर, वैटिंग रूममे बैठा था । मेरा सामान कहा है, इसकी खबर मुझे न थी। किसीसे पूछनेकी हिम्मत भी नहीं होती थी। कही फिर अपमान हो, मार खानी पडे तो ? ऐसी दशामे, are कापते हुए नीद कहांसे आती । मन चक्करवार भूलेपर सवार हुआ। वडी रातको निश्चय किया, "निकल भागनी तो नामर्दी है, लिए हुए कामको पूरा करना ही चाहिए। व्यक्तिगत अपमान सहना पडे, मार खानी पडे, तो सह और खाकर भी प्रिटोरिया पहुचना ही चाहिए।" प्रिटोरिया मेरे लिए केंद्र स्थान था। मुकदमा वही चल रहा था । अपना काम करते हुए कोई उपाय हो सके तो करूं । यह निश्चय कर लेनेपर मनको कुछ शांति हुई, हृदयमें कुछ बल भी आया । पर मे सो तो नहीं ही सका । सवेरा होते ही मैंने दादा अब्दुल्लाकी कोठी और रेलवेके जनरल मैनेजरको तार किया। दोनो जगहसे जबाव भी या गया। दादा अब्दुल्ला और उनके उस वक्त नेटालमे