भारतीयाने क्या किया ११ ६३ दक्षिण अफ्रीका के अखवारोने वकील-मंडलको हंसी उड़ाई और कुछने मुझे बधाई भी दी। जो कामचलाऊ कमेटी बनाई गई थी उसे स्थायी रूप दिया गया। मैने कांग्रेसकी एक भी बैठक देखी तो नही थी, पर कांग्रेसके बारेमे पडा था। हिंदके दादा ( दादा भाई) के दर्शन कर चुका था। उनकी मैं पूजा करता था । अतः कांग्रेसका भक्त तो होना ही चाहिए था । उसके नामको लोकप्रिय बनानेका भी ख्याल था । नया जवान नया नाम क्यों छूढने जाय ? फिर उसमे भूल कर बैठनेका भी भारी भय था । अत मेने सलाह दी कि कमेटी 'नेटाल इंडियन कांग्रेस' नाम ग्रहण करे । काग्रेसके विषयमे अपना अधूरा ज्ञान अधूरी रीतिसे मैने लोगो के सामने रखा । १८९४ ६० के मई या जनमे काग्रेसकी स्थापना हुई। भारतीय सस्था और इस सस्थामे इतना अंतर था कि नेटाल कांग्रेसकी बैठके बारहो मास हुआ करती थी और जो सालमे कम-से-कम तीन पोड दे सके वही उसको सदस्य हो सकता था । अधिक-से- अधिक तो जो कुछ भी दिया जाय वह सधन्यवाद स्वीकार किया जाता। पांच-सात सदस्य सालाना २४ पोड देनेवाले भी निकल आए । १२ पौड देनेवालोंकी तादाद तो काफी थी। एक महीनेके अंदर कोई तीन सौ सदस्योंके नाम दर्ज हो गये। हिन्दू, मुसलमान, पारसी, ईसाई आदि जिवने धर्मों और प्रान्तोंके लोग वहा थे उसमे शामिल हुए। पहले वरसभर काम बड़े जोशसे चला । सेठ कोग निजकी सवारियां लेकर दूर-दूरके गावोगे नये मेवर बनाने और चंदा इकट्ठा करने जाते थे। हर आदमी मागते ही पैसा नही दे देता था । उन्हें समझाना होता था । समझानेमे एक प्रकारकी राजनैतिक जिला मिलती थी मोर लोग परिस्थितिसे परिचित होते थे । फिर हर महीने कम-से-कम एक बार तो काग्रेसको बैठक होती
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