भारतीयोंने क्या किया ? -१ नियुक्त किया। उन्होंने बड़ी होशियारीसे काम किया । स्व० आदमजी मिया खां अग्रेजी अच्छी जानते थे । अनुभवसे अपने कामचलाऊ ज्ञानको उन्होंने खूब बढ़ा किया था। गुजराती- का सामान्य अभ्यास था । उनका व्यापार खासतौर से हवगियोमे था। अतः जुलू भाषा और वशियोंके रस्म-रिवाजकी उन्हे अच्छी जानकारी थी । स्वभाव ज्ञात और बहुत ही मिलन- सार था। जितना जरूरी हो उतना ही वोलनेकी आदत थी । यह सब लिखनेका हेतु इतना ही है कि बड़ी जिम्मेदारी के पदपर काम करने के लिए अग्रेजीके या दूसरे अक्षरज्ञानकी जितनी आवश्यकता होती है उससे कही अधिक आवश्यकता सचाई, शान्ति, सहनशीलता, दृढता, अवसरकी पहचान और तदनु- रूप कार्य करनेकी योग्यता, हिम्मत और व्यवहार-बुद्धिकी होती है। ये गुण न हों तो अच्छे-से-अच्छे अक्षरज्ञानको भी सामाजिक काममे घेले भर कीमत नही होती। १८९६ के मध्यमे में हिंदुस्तान लौटा। कलकत्तेके रास्ते आया, क्योंकि उस वक्त नेटालसे कलकत्ते जानेवाले स्टीमर आसानीसे मिल जाते थे । गिरमिटिया कलकत्ते या मद्राससे जहाजपर सवार होते थे । कलकत्तेसे बंबई बाते हुए रास्ते मे मेरी ट्रेन छूट गई। इससे मुझे एक दिन इलाहा- बादमे अटकना पड़ा। यही से मैने अपना काम शुरू किया । 'पायोनियर के मि० चेजनीस मिला। उन्होंने सौजन्यके साथ बातें कीं। सचाईके साथ मुझे बता दिया कि उनका झुकाव उपनिवेशोकी ओर है; पर कहा कि आप जो कुछ लिखेंगे उसे पढ जाऊंगा और अपने पत्रमे उसपर टिप्पणी भी लिखूंगा । मैने इतनेको हो काफी समझा । 1 देशमे रहनेके दिनोमे दक्षिण अफ्रीका के भारतीयोकी स्थितिके विषय मेने एक पुस्तिका लिखी। उस पर लगभग सभी लखवारोमे टीका-टिप्पणी हुई। उसके दो संस्करण
पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/७४
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