भारतीयों ने क्या किया ? -२, मैने कहा - "इसके बारेमे तो ये कुछ-कुछ जानता हूं ।" लोकमान्य — "यहा सभा करना तो आसान है; पर में देखता हूँ कि आप अपना सवाल सर्व पक्षोके सामने रखना चाहते है और मदद भी सबकी चाहते हैं। यह वात पसंद आती है, पर आपकी सभाका सभापति हममेसे कोई हो तो दक्खिन सभावाले नही आयगे और दक्खिन सभाका कोई आदमी सभापति बने तो हममेसे कोई नही जायगा । अतः आपको तटस्थ समापति ढूढना चाहिए। में तो इस मामलेमें सलाह भर दे सकता हूं। दूसरी मदद मुझसे नही हो सकेगी। आप प्रोफेसर भांडारकरको जानते है ? न जानते हो तो भी उनके पास जाइए। वह तटस्य माने जाते है। राजनैतिक कामो मे शामिल भी नहीं होते, पर शायद आप उन्हे ललचा सके। श्री गोखलेसे इस वारेमे बात कीजिए। उनकी सलाह भी लीजिए। बहुत करके वह भी आपको यही सलाह देगे । प्रोफेसर भांडारकर जैसा पुरुप सभापति बनना स्वीकार कर ले तो मुझे विश्वास है कि दोनों पक्ष सभाका आयोजन करनेका काम उठा लेंगे । हमारी मदद तो इसमें आपको पूरी रहेगी ।" यह सलाह लेकर में गोखलेनीके पास गया। इस पहले मिलनमे ही उन्होने मेरे हृदयमे कैसे राज्याधिकार प्राप्त कर लिया. इसे तो दूसरे प्रसगमें लिख चुका हू । जिज्ञासूजन 'यंग इंडिया' या 'नवजीवन की फाइल देखनेका कप्ट करे ।' लोकमान्यकी सलाह गोखलेबीको भी पसंद आई। में तुरंत प्रोफेसर भाडारकर के पास पहुचा । उन विद्वान् बुजुर्ग के दर्शन किए। नेटालकी कहानी ध्यानपूर्वक सुनकर उन्होने कहा- "आप देखते हैं कि में तो सार्वजनिक जीवनमे क्यचित् ही पता हू । अव तो बूढा भी हुआ। फिर भी आपकी 'देखिये 'यम इडिया' १३ जुलाई११२१, 'नवजीवन' २८ जुलाई' २१
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