७० afar फोकाफा सत्याग्रह बातोंने मेरे मनपर बहुत असर किया है। आपके सब पक्षोकी सहायता प्राप्त करनेके विचारको में पसंद करता हूं। फिर आप हिंदुस्तानकी राजनीति से अनजान जान पडते हैं और युवक हैं। अत दोनो पक्षोसे कहिए कि मेने आपका अनुरोध स्वीकार कर लिया। जब सभा हो तो उनमेसे कोई भी मुझे खबर दे देगा तो में जरूर हाजिर हूंगा ।" पूनामें सुंदर सभा हुई । दोनों पक्षोंके नेता उपस्थित हुए और भाषण दिये । 1 अनन्तर मै मद्रास गया। वहां जस्टिस सुब्रह्मणम् ऐयरसे मिला । श्री आनंद चालु, 'हिंदू' के तत्कालीन सपादक श्री जी० सुब्रह्मण्यम्, 'मद्रास स्टैंडर्ड के सपादक श्री परमेश्वरम् पिल्ले, प्रख्यात वकील श्री भाष्यम् आयगार, मि० नॉर्टन आदिसे भी मिला । वहा भी सभा हुई । वहासे में कलकत्ते गया । श्री सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, महाराज ज्योतीन्द्रमोहन ठाकुर, 'इग्लिशमेन' के संपादक मि० साउर्स आदिले भी मिला । वहा सभाकी तैयारी हो रही थी कि इतनेमे, यानी १८९६ ई० के नववर महीने में, मुझे नेटालसे तार मिला "अविलव आइए ।" में समझ गया कि हिंदुस्तानियो के खिलाफ कोई नया आन्दोलन उठा होगा । अत कलकत्तेका काम पूरा किये बिना हो पीछे फिरा और बम्बईसे जानेवाले पहले ही जहाजपर सवार हो गया । यह स्टीमर दादा अब्दुल्लाको फर्मने खरीद लिया था और उसके अनेक साहसोमे नेटाल और पोरवदरके वीच जहाज चलानेका यह पहला साहस था । इस स्टीमरका नाम 'कोलँड' था। इस स्टीमर के बाद तुरंत ही पर्शियन स्टीम नेविगेशन कपनीका स्टीमर 'नादरी' भी नेटालके लिए रवाना हुआ । मेरा टिकट 'कोलैंड का था । मेरा कुटुव भी मेरे साथ था। दोनो जहाजोंमे सब मिलाकर दक्षिण अफ्रीका जाने वाले कोई ८०० मुसाफिर रहे होगे । हिंदुस्तानमे जो आदोलन मैने किया वह इतनी बड़ी चीज
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