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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/८५

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७८ दक्षिण श्रीकाका सत्याग्रह फेंकने लगे। कुछ अधेड उम्रवाले गोरे भी उनमें शामिल हो गए। धीरे-धीरे हल्ला वढा । मि० लॉटनने देखा कि पैदल जानेमें खतरा लेना है । अत उन्होंने 'रिक्शा' बुलाया । 'रिक्षा' के मानी है आदमीके खीचनेकी छोटी-सी गाडी । मै तो कभी 'रिक्शा' में बैठा ही न था, कारण कि जिस सवारी- को आदमी खीचता हो उसमे बैठने से मुझे सख्त नफरत थी ! मगर आज मुझे जान पड़ा कि रिक्शामे बैठ जाना मेरा धर्म है । पर भगवान् जिसको बचाना चाहते हों वह गिरना चाहे तो भी नहीं गिर सकता, इसका तो मुझे अपने जीवन के पाच- सात कठिन प्रसंगोंमें प्रत्यक्ष अनुभव हो चुका है । में नही गिरा, इसका तनिक भी यश में नहीं ले सकता । रिक्शा खीचनेवाले हवशी ही होते है । छोकरो और बडी उम्रवाले गोरोंने भी रिक्शावालेको धमकाया कि तुमने इस आदमीको रिक्शामें बैठाया तो हम तुम्हें पीटेंगे और तुम्हारा रिक्शा भी तोड डालेंगे। अत रिक्शावाला 'खा' अर्थात् ना कहकर चलता बना और मेरा रिकगामे बैठना रह गया । अब पैदल चलकर जाने के सिवा हमारे पास दूसरा रास्ता नहीं रहा । हमारे पीछे खासा मजमा जुट गया । ज्यों-ज्यो हम आगे वढते, मजमा भी बढता जाता था। मुख्य रास्ते बैस्ट स्ट्रीटमे पहुचनेपर तो छोटे-बडे संकडों लोग उसमें शामिल हो गये । एक तगडे आदमीने मि० लॉटनको दोनो हाथों में पकडकर मुझसे अलग कर दिया । अतः अब उनकी स्थिति ऐसी न रही कि मेरे पास पहुच सकें। मुझपर गालियो, पत्थरो और जो कुछ भी उनके हाथमे आया उस सब की वर्षों होने लगी। मेरी पगड़ी सिरसे गिरा दी गई। इतनेमें एक मोटे-तगड़े आदमीने पहुचकर मुझको थप्पड़ जमाया और फिर लात भी मारी। में चक्कर खाकर गिरही रहा था कि इतनेमें रास्तेके पासके एक मकान के आगनकी रेलिंग मेरे