I भारतीयाने क्या किया ? ---२ ७६ हाथमे आ गई। मैने जरा दम लिया और चक्कर दूर होनेपर आगे वढा । जीता घर पहुंचनेकी आशा लगभग छोड़ चुका था; पर इतना मुझे अच्छी तरह याद है कि उस वक्त भी मेरा दिल मारनेवालोंका रत्ती भर भी दोष नही देखता था । इस तरह में अपना रास्ता से कर रहा था कि इतनेमें डर्बनके पुलिस सुपरिटेडेटकी पत्नी सामने की ओरसे आ निकली । हम एक-दूसरे को अच्छी तरह पहचानते थे। यह महिला वहादुर थी । यद्यपि आकाशमे वादल घिर रहे थे और सूरज भी डूबनेको था, फिर भी इस महिलाने अपनी छतरी मेरी रक्षार्क लिए खोल दी और मेरी बगलमे होकर चलने लगी। स्त्रीका अपमान और वह भी डर्वनके बहुत पुराने और लोक- प्रिय कप्तानकी पत्नीका यह गोरे नहीं कर सकते थे । उन्हे चोट भी नही पहुचा सकते थे । अत उनको बचाते हुए मुझपर जो मार पड़ती वह वहुत हल्की होती । इस बीच पुलिस सुप- रिंटेंडेंटको इस हमलेकी खबर मिली और उन्होंने पुलिसका एक दस्ता भेज दिया, जिसने मुझको घेर लिया । हमारा रास्ता पुलिस चौकीकी बगलसे होकर जाता था। वहां पहुंचे तो देखा कि पुलिस सुपरिटेडेट खड़े हमारी राह देख रहे है । उन्होंने मुझे चौकी ही चले जानेकी सलाह दी। मैने उन्हे धन्यवाद दिया और उसमे आश्रय लेनेसे इनकार कर दिया । मैने कहा कि मुझे तो अपने ठिकाने पर ही पहुंचना है। मुझे डर्बनके लोगोकी न्यायवृत्ति और अपने सत्यपर विश्वास है। आपने जो मेरे रक्षार्थं पकिस भेजी उसके लिए अहसानमद हू । इसके सिवा मिसेज अलेक्जेन्डरने भी मेरी रक्षा की है ।" में सही-सलामत रुस्तमजी के यहां पहुंचा। वहां पहुंचते- पहुंचते लगभग शाम हो गई थी। 'कोलँड' के डाक्टर दाजी बरजोर रुस्तमजी सेठके यहां मौजूद थे। उन्होने मेरी चोटोका इलाज शुरू किया। चोटे देखी। वे अधिक नही थी ।
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