भारतीयोने क्या किया ? ३ ८७ गया, अब इसका उल्लेख आवश्यक है। कांग्रेसको ब्रिटिश कमेटी के साथ तो संबंध जोड़ना ही चाहिए था। इसलिए हर हफ्ते हिंदके दादा (दादाभाई नवरोजी) और कमेटीके अध्यक्ष सर विलियम वेडरबर्नको परे विवरणकी चिट्ठी लिखी जाती और जब-जब आवेदन-पत्रकी नकल वगैरह भेजनेकी जरूरत होती तब-तब डाक खर्च वगैरह और कमेटीके साधारण खर्चमें सहायताके रूपमे कम-से-कम १० पौंड भेज दिए जाते । यही दादाभाईका एक पवित्र सस्मरण लिख दू | वह इस कमेटी के अध्यक्ष न थे, फिर भी हमे यही जान पड़ा कि रुपये उन्हीकी मार्फत भेजना हमे शोभा देगा, वह भले उन्हें हमारी ओरसे अध्यक्षको दे दिया करे। पर पहली ही बार जो रकम हमने भेजी, दादाभाईने उसे लौटा दिया और लिखा कि रुपये भेजने आदि कमेटी से संबंध रखनेवाले काम आपको सर विलियम वेडरबर्नको मार्फत ही करने चाहिए । मेरी अपनी (दादाभाईकी) मदद तो रहेगी ही। पर कमेटीकी प्रतिष्ठा सर विलियम वेडरबर्नकी मार्फत काम लेनेमे ही बढ़ेगी। मैंने यह भी देखा कि दादाभाई इतने बूढे होनेपर भी अपने पत्रव्यवहारमे बहुत ही नियमित थे । उन्हें कुछ लिखना न हो तो भी पत्रकी पहुंच तो लोटती डाकसे मा हो जाती और उसमे आश्वासन के दो शब्द तो होते ही। ऐसी चिट्ठियां भी खुद ही लिखते और इन पहुंचवाली चिट्ठियोकी नकल भी अपनी टिशू पेपर बुकमे छाप लेते । । एक पिछले प्रकरण में यह भी दिखा चुका हू कि यद्यपि कांग्रेसका नाम आदि हमने रखा था, पर अपने मसलेको एक पक्ष- का प्रश्न बना देनेकी बात हमने कभी सोची ही नही थी । इससे दादाभाईकी जानकारीमें दूसरे पक्षोंके साथ भी हमारा पत्र- व्यवहार चलता रहता। इसमें दो आदमी मुख्य थे. एक सर मचेरजी भावनगरी और दूसरे सर विलियम विलसन इंटर। सर
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