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पृष्ठ:Gandhi - Dakshin Afrika Ke Satyagraha (Hindi).pdf/९६

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1 बोअर-युद्ध ८६ रहनेके दिनोंमें वह स्व० सर विलियम हटर, सर मंचेरजी भावनगरी और काग्रेसकी ब्रिटिश कमेटी के साथ बरावर मिलते रहते थे। वैसेही वे भारतीय सिविल सर्विसके पेशनर कर्म- चारियों भारतीय सचिवके दफ्तर और उपनिवेश विभाग आदिसे भी सम्पर्क रखते थे । इस प्रकार एक भी विशा, जहां हमारी पहुंच हो सकती थी, कोशिशसे खाली नहीं रखी । इस सबका फल इतना तो पक्के तौरसे हुआ कि प्रवासी भार- तीयोंको स्थिति बढ़ी सरकार के लिए एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न बन गई और उसका भला-बुरा असर दूसरे उपनिवेशोंपर भी पड़ा । यानी जहा जहा हिंदुस्तानी वसते थे वहा वहाँ हिंदु- स्तानी और गोरे दोनों जाग्रत हो गए ।

६ :

बोअर युद्ध जिन पाठकोंने पिछले प्रकरणोको ध्यानपूर्वक पढ़ा होगा उन्हें इसकी कल्पना हो गई होगी कि बोमर-युद्धके समय दक्षिण अफ्रीका भारतीयोंकी क्या स्थिति थी । तबतक हुए प्रयत्नोंकी चर्चा भी की जा चुकी है। १८९९ ई० मे डाक्टर जेमिसनने, खानोंके मालिको के साथ हुए गुप्त परामर्शके अनुसार, जोहान्सबर्गपर घावा किया । दोनोकी आशा तो यह थी कि जोहान्सबर्गपर कब्जा हो जाने के बाद ही बोबर सरकारको उनके धावेकी खबर होगी; पर यह हिसाब लगाने मे डा० जेमिसन और उनके दोस्तोने भारी भूल की । उनका दूसरा मदाजा यह था कि उनकी गुप्त योजना प्रकट हो भी गई तो रोडेशियामे सिखाये हुए निशानवाज- के सामने रण-शिक्षासे कोरे बोअर किसान क्या कर