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पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/१०४

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मुझे जिस विचारसे ग्लानि हुआ कि सभी मुसाफिर दिलसे अिस शैतानीभरे काममे शामिल थे, अगरचे तिसपर भी मेरी सलाह यही होती कि जुन भाभीको अपनी जानका खतरा उठाकर भी सुसका विरोध करना चाहिये था । मैंने महसूस किया है कि अग्रेज सरकार के खिलाफ हमारी लाभी बहादुरकी अहिंसाके आधारपर नही थी। सुसका नतीजा मे और साथ ही सारा देश भुगत रहा है। अगर हो सके, तो में अपने जीवनके बचे हुये दिन, लोगों में बहादुरकी अहिंसा पैदा करनेमे विताना चाहता है। यह अक मुtिer काम है। में मंजूर करता हॅू कि पाकिस्तानमें जो कुछ हुआ है और हो रहा है, वह बहुत बुरा है। मगर हिन्दु- स्तानीसंयमे जो कुछ हो रहा है, वह भी लुतना ही चुरा है। जिस बात पता लगाते बैठना फिजूल है कि शुरुआत किसने की, या किसकी गलती ज्यादा थी। अगर दोनों अब दोस्त बनना चाहते हैं, तो सुन्हें यीती हुआ बातें भूलनी होंगी । अगर वे वचन और कर्मसे चला देनेकी बात छोड़ दें, तो कलके दुश्मन आज दोस्त पन सकते हैं। अखवारोंका फर्ज़ अखबारोंका जनतापर जबरदस्त असर होता है । सम्पादकोंका फर्ज है कि वे अपने अखबारोंमें गलत खबरें न दें या असी खबरें न छापें, जिनसे जनतामै सुत्तेजना फैले । भेक अखवारमै मैने पडा कि रेवाबीम मेवाने हिन्दुओं पर हमला कर दिया । जिस खचरने मुझे बेचैन कर दिया । मगर दूसरे दिन अखबारोंमे यह पढकर मुझे खुशी हुआ कि यह खबर गलत थीं । भैसे कभी खुदाहरण दिये जा सकते हैं। सम्पादकों और ग्रुप-सम्पादकको ख़बरें छापने और सुन्हें खास रूप देने में बहुत ज्यादा सावधानी देनेकी जरुरत है। आजादीकी हालत में सरकारोंके लिये यह करीब करीब अर्ममव है कि वे अखवारोंपर काबू रखें। जनताका फर्ज है कि वह अखबारोंपर कड़ी नगर रखे और उन्हें ठीक रास्तेपर चलाये । पढी-लिखी जनताको चाहिये कि वह भटकानेवाले या गन्दे अखवारोकी मदद करनेसे मिन्कार कर दे 1