भागना शुरु कर दिया है। मे भिमका कारण नहीं जानता। मेरे साथ काम करनेवाले - जिनमें सतीशराव और खादी प्रतिष्ठानके दूसरे लोग मी है - प्यारेलालजी, स्तु गाधी, अमतुलसलाम बहन और सरदार जीवनसिंघजी आज भी वहाँ काम कर रहे है । मैंने खुद नोभालाबीग दौरा करके लोगोंको यह समझाने की कोशिश की थी कि वे मारा कर छोड़ दें। जिस खयरने मुझे लोगों और सरकार के फर्डपर सोचनेका मौका दिया है । जो अक रामो छोडर दूतरे राजमें आ रहे है, वे यह मोचते होंगे कि हिन्दुस्तानी सबने सुनकी हालत बड़ी अच्छी हो जायगी । लेकिन सुनका यह खयाल गलत है। पूरे दिलसे चाहनेपर भी सरकार जितने शरणार्थियोंके खाने-पीने और रहने वगैराका भिन्तजान नहीं कर सकती । वह शरणार्थियोंके लिये फिरसे पहले जैसी हालत पैदा नहीं कर सकेगी। यह लोगोंको यही सलाह दे सकती है कि वे अपनी अपनी जगहोंपर जमे रहें और अपनी रक्षाके लिये भगवानके तिवा किसीकी तरफ न देखें। अगर झुन्हें भरना भी पड़े, तो ये बहादुरीचे अपने घरोंमें ही नरें । स्वभावत सपत्री सरकारका वह फर्ज होगा कि वह दूसरी सरकारसे अपने अल्पसख्यकोंकी सुरक्षात्री मांग करे। दोनों सरकारोंका यह फर्क है कि वे मौजूदा हालतोंमें मिलजुलकर सही बरताव करे । अगर यह सुचित बात नहीं होती, तो जितका लाजमी नतीजा होगा लाभी । लाओकी हिमायत करनेवाला में आखिरी मादमी होलूँगा । लेकिन मै यह जानता हूँ कि जिन सरकारोंके पास फौजें और हथियार हैं, वे लाभीके तिवा दूसरा रास्ता अख्तियार कर ही नहीं वस्तीं । भैसा कोभी रास्ता बर्वनाशका रास्ता होगा । आवादीके फेरवदलमें होनेवाली मोतसे किसीको कोभी फायदा नहीं होता। फेरबदलसे राहत- कामकी और लोगोंको फिरसे बसानेकी बड़ी बड़ी समस्याओं चढ़ी होती हैं ।
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