। जलनों और पन्नों शामिल हुआ है और दूसरे कैम्पोंका भी मुझे अनुभव है । मे १९१५ में हरद्वारके कुम्भ मेले में गया था। वहीं भोटे हुये अपने नागियोंके साथ भारत सेवक समिति के कैम्प में सेवा करने सौभाग्य मिला था । लुमके बारेमें जिसके लिवा मुझे नहीं है कि वहां मेरी और मेरे माथियोंकी प्रेमसे फिर वी नी । लेकिन हमारे लोग क्षमा फैम्प-जीवन बिताते है, सुसे देखकर मुझे कोभी राशी नहीं होती । इनमें समानी सफाभीकी भावनाकी कमी ऐ । नतीजा यह होता है कि कैम्प चतरनाक गन्दगी और कहा-करकट जना हो जाता है, जिनसे छूतकी भीमारियाँ फैलनेत्रा दर रहता है । इमारे पात्राने आम तौरपर जितने गन्दे होते हैं कि जिसका ध्यान नहीं किया जा मता । लोग गोचते हैं कि वे कहीं भी टट्टी-पेणाव कर नरते हैं । यहाँ तक कि वे पवित्र नदियोंके किनारोंको भी नहीं छोड़ते, जहाँ अक्सर लोग जाया आया करते है । जिसे लोग भेक तरहका अपना हरु नरसते हैं कि भरने पोतियों का घोड़ा भी सयात किये दिना से कहीं भी थूक मरते हैं । हमारी रसोीश भिन्तनाम मी कोभी ज्यादा अच्छा नहीं होता । मक्खियाँका दोस्तोंकी तरह हर जगह स्वागत किया जाता है । रमोओकी चीजोंको नसे बचानेकी कोभी चिन्ता नहीं को जाती । हम यह भूल जाते हैं कि वे भेक पल पहले किसी भी तरह की गन्दगी और कूदे वरस्टपर बैठी होगी और किसी छूतकी बीमारीके कोटे अपने साथ ले आभी होंगी । केम्पोंमें किसी योजनाके आधारपर लोगोंके रहने मिन्तजाम नहीं किया जाता । कैम्प-जीवनकी यह तसवीर में चढाचदार नहीं दिखा रहा हूँ । मे केम्योंमें होनेवाले गोरगुलका कि किये बिना भी नहीं रह सकता, जो चहीं रहनेवालेको सहना पड़ता है । व्यवस्था, योजना और पूरी पूरी सफामके लिये मे फौजी कैम्पको आदर्श मानता हूँ | मैंने फौजकी जरूरतको क्मी नहीं माना । लेकिन जिसका यह मतलब नहीं कि तुममें कोभी अच्छा है ही नहीं । सुससे हमें अनुशासन, मिलेजुले समाज जीवन, सफाभी और समयके ठीक ठीक बेटवारेका, जिसमें हर ग्रुपयोगी कामके लिये जगह होती है, ८७
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