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पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/१२५

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मैंने सिर्फ नहीं चाव च्छी, जिसके सच होनेन भू विश्वास करता हूँ । सत्यामहमें हार कमी होती ही नहीं। न सुचनें पीछे हटने जागि ही है। यहीं ने रू० पण्डित रामदी की पहली लाजिन कहूँगा --"हम मर नाकी लेकिन घर नहीं मानेंगे।" ने ये लामिन पंजाबके मार्शल के जनानेनें लिखी थीं । सुन दिनों पंजाब के लोगोंको सेवा जलोद और बेभिज्जत किया गया था, जिसकी जितिहास कोसी निवाल नहीं मिलती । लेकिन विकी ये साजिने हर समय लागू होती हैं । चत्याही शर्त यही है कि हमारा ध्येय वच्चा और ल्हो हो । डीभर सत्यानही नी हिन्दुस्तान्त्री जिल्लको बचाने और बनाये रखनेके लिये काफी है। इन्होंने तरनें तुझसे यह भी कहा है कि ने लोगों पहने चाहियोंकी भवदके सिने पैसे देनेकी अपील करू । दक्षिण हिन्दुस्तानी गरीब नहीं हैं। लेकिन मे कुछ सनम चला हूँ | भाज हिन्दुस्तान वार्षिक सलाहियत्री अरुको में गुजर रहा है । भाभीमालीके खून और बाकी तादादने आवादीचे फेरबदलीसे हिन्दुस्तानकी मानदनी करोडोच घाटा हुआ है। आजकी हालत मेरी हिन्दुस्तानियोंसे यह कहनेकी हिम्मत नहीं पड़ती कि वे दक्षिण राजामहियोंके लिये देते न दें। मदद देना चाहे, तो मुझे ही होगी मॉरिशस और दूसरी जगहोंने वही । मगर कभी निव तरहकी हिन्दुस्तान्के बाहर पूर्व नका, तदादने हिन्दुस्तानी रहते हैं। नसे ज्यादातर लोग खुदा हैं। सुनने हिन्दू मुसल्मान करनेवा भी कोली धमाल नहीं है । वे सब हिन्दुस्तानी हैं। मैं सुनले यह माथा रखता हूँ कि वे अपने भाभियोंके लिये देते, जो हिन्दुलानी भिज्नतके लिये यहाँ ला रहे हैं । चलानहने को हुने लोग वैवमारानकी श्री नहीं चाहते। इन्हें रोजानाकरी जरूरते पूरी करनेके विज पैचा चाहिये । हिन्दुस्तान के बाहर रहनेवाले हिन्दुस्तानिया यह कर्व है के अवालले जरूरी मदद दें ।