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पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/१३६

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मुसलमानों को यहाँ से चले आना होगा या अपने सिर कटा देने होंगे । मुझे आशा है कि यह सिर्फ सम्पादककी ही राय है। अगर यह जनता के काफी बड़े हिस्सेकी राय हो, तो वही शरमकी यात है और जिससे हिन्दुस्तानको हस्ती ही मिट जानेका डर है। मैंने कल शामको बताया या कि fre acertiकी नीतिके क्या नतीजे हो सकते हैं । भाखिरकार जिस नीतिसे हिन्दू और सिक्ख आपसमें ही भेकदूसरेकी हत्या करने लगेंगे। अक दोस्तने मुझे क्ताया है कि जिस दिशामे शुरुआत हो भी चुकी है । लोग अखवारोंको गीता, कुरान और वामिविक मानने लगे हैं । सुनके लिये छपा परचा धर्मपुस्तकका सत्य बन गया है । यह धात सम्पादकों और संवाददाताओं पर की भारी जिम्मेदारी डालती है । आज तीसरे पहर जो चीज मुझे पढकर सुनाओ गभी, देसी फोभी वीज कभी न छपने दी जानी चाहिये । से अखवार चन्द कर दिये आने चाहियें । रियासतें किधर १ भेक दूसरे दोस्तने मुझे रियासतों में मची हुभी अन्धाधुन्धीके पारेमें बताया है। अग्रेजी हुकूमतने रियासतोंपर योग नियंत्रण रखा या । सार्वभौम सत्ताके चले जानेसे यह हट गया। सरवारने सुसकी जगह की है, लेकिन सुनकी मददके लिये ब्रिटिश संगीनोंकी ताकत तो नहीं है। यह सच है कि ज्यादातर रियासतें हिन्दुस्तानी सघमें जुब गभी हैं। फिर भी वे अपनेको केन्द्रीय सरकारसे बँधी हु नहीं समझती । बहुतसे राजा यह खयाल करते हैं कि वे ब्रिटिश नार्वभौम सत्ताके कमाने मे जितने आजाद ये मुसखे आज कहीं ज्यादा आजाद हैं, और वे अपनी प्रजाके साथ कैसा भी बरताव कर सकते हूँ। मै खुद अक रियासतका रहनेवाला हूँ और राजाओंका दोस्त हूँ। क दोस्तके नाते मै राजामोंको यह चेतावनी देना चाहता हूँ कि अपने आपको बचानेका सुनके लिये ओक यही रास्ता है कि वे अपनी अजाके सच्चे सेवक और ट्रस्टी बन जायें । वे निरंकुश राजा वनकर नहीं जी भक्ते । न वे अपनी प्रजाको मिटा ही सकते हैं । हिन्दुस्तान की तकदीर में जो भी वदा हो, अगर कोभी राजे निरंकुश शासक बनने का सपना देखते १०९