४३ भेकमात्र लगन २४-१०-४७ 1 प्रार्थना के बाद अपना भाषण शुरू करते हुये गाधीजीने कहा कि कुछ दिनों पहले अखबारोंमें निकला था कि २७ अक्तूवरको दिल्लीने होनेवाली अशियाटिक लेकर कान्फरेन्सका में सुद्घाटन करनेवाला हूँ । में नहीं जानता, किसने यह खबर अखबारोंमें से 1 मिल सबके बारेमें में कुछ नहीं जानता । मैने अक अतवारनवीससे कहा भी था कि वे जिस रिपोर्डका प्रतिवाद छपवा दें, मगर कोभी प्रतिवाद नहीं निकला। मै कहना चाहता हूँ कि जिस वक्त मैं अपनी सारी शक्ति सुख समस्याके हल करनेमें लगा रहा हूँ, जो आज सबसे ज्यादा अहम है । मे दूसरी किसी बात में अपना दिमाग नहीं लगा सकता | हिन्दू, मुसलमान, पारसी, औसाभी और दूसरे लोग हिन्दुस्तानके असे ही लड़के और क्यों हैं और झुन्हें नागरिक्ता भेक्ते अधिकार है। बचपन से ही मेरे सामने यह आदर्श रहा है । आजादी frette बाद यह आदर्श गिरता-सा जान पड़ता है । जो भजन आपने अभी सुना है, सुसमें कहा गया है कि " चाहे कोभी तुम्हारी तारीफ करे या तुम्हें गाधी दे, इससे तुम्हें उन या नाराज नहीं होना चाहिये, क्योंकि वह त भगवानको सौंप देनेके लिये है। " ने यही करनेकी कोशिश कर रहा हूँ। जिव वातको मै सच समझता हूँ, भुते लगातार ता रहूँगा, फिर कोभी लुते पसन्द करे या नापसन्द | अपनी श्रद्धा यल रखिये गाधीजीने सुन लोगोंही बढकिस्मतीपर दुःख जाहिर किया, को कल तक धनवान थे और मान चेयासत शरणार्थी हो गये हैं, जिनके वनपर कपड़ा नहीं है और न रहनेको घर है। गांधीजीने कहा कि ११४
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