आपको अक्सर बडा अपराधी समझता हूँ । अपर जो हम सबका सबसे बा जेलर बैठा हुआ है झुसे कोमी मी घोखा नहीं दे सकता । जेल दिमागी अस्पतालोंका काम करें आजाद हिन्दुस्तान में कैदियोंके जेल कैसे हों । बहुत समयसे मेरी यह राय रही है कि सारे अपराधियोंके साथ बीमारों- जैसा परताव किया जाय और खेल सुनके अस्पताल हो, जहाँ जिस क्लास के बीमार जिलाज के लिये भरती किये जायें । कोभी आदमी अपराध सिलिये नहीं करता कि जैसा करनेमें असे मजा आता है । अपराध सके रोगी दिमागकी निवानी है । बेलमें असी किसी खास बीमारीके कारणोंका पता लगाकर उन्हें दूर करना चाहिये । जब अपराधियोंके जेल सुनके अस्पताल बन जायेंगे, तब सुनके लिये मालीशान भिमारतोकी जरूरत नहीं होगी । कोसी देश यह नहीं कर सकता । तब हिन्दुस्तान जैसा गरीब देश तो अपराधियोंके लिये वही वही भिमारतें कहाँसे बनावे लेकिन जेलके कर्मचारियोंकी दृष्टि अस्पतालके डॉक्टरों और नसों जैसी होनी चाहिये । कैदियोंको महसूस करना चाहिये कि जेलके अफसर सुनके दोस्त हैं। अफसर वहाँ जिसलिये है कि ये अपराधियोंको फिरले विमानी तन्दुरुस्ती हासिल करने में मदद करें । सुनका काम अपराविर्बोको किसी तरह सतानेका नही है । जनप्रिय सरकारोंको जिसके लिये जरुरी हुक्म निकालने होंगे, लेकिन जिस बीच जेलके कर्मचारी अपने बन्दोबस्तको जिन्सानियतमरा बनानेके लिये बहुत कुछ कर सकते हैं। कैदियोंका क्या फर्ज है कैदियोंका फर्ज़ पहले कैदी रह चुकनेके नाते मैं अपने साथी कैदियोंको मलाह दूँगा कि वे जेलमें आदर्श कैदियों जैसा वरसाव करें। सुन्हें जेलके अनुशासनको तोडनेसे बचना चाहिये । जो भी काम झुन्हें सौंपा जाय, उसमें अन्हें अपना दिल और आत्मा दोनों लगा देने चाहियें। मिसाल के लिये कैदी अपना खाना खुद पकाते हैं । जुन्हें चावल, वाल, या दूसरे मिलनेवाले अनाजको साफ करना चाहिये, ताकि समें कंकड, रेत, भूसी ११७
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