1 दूसरे लोगों द्वारा भेक अंतराज करनेवालेका मुँह बन्द कर दिये जानेक सम्भावना हो, तब मेरो अहिंसा मुझे चेतावनी देती है कि मे श्रुत शख्सको सुपेक्षा न करूँ, फिर वह अकेला ही क्यों न हो । हाँ, अगर पूरी सभा प्रार्थनामें कुरान की आयतें पढ़नेपर जैवराज करे, तब मेरा रास्ता दूसरा होगा । तब मेरा यह फर्ज हो जायगा कि अपमानित होनेका खतरा उठाकर भी मैं प्रार्थना करूँ। जिसके साथ ही यह बात भी ध्यान देने लायक है कि अंक अंतराज करनेचादेके लिये मितने ज्यादा लोगोंको निराग न किया जाय । जिसका मिलाज मामूली है । अगर ज्यादा तादादवाले लोग अपने आपपर काबू रखें और अकेले भेतराज करनेवाले के खिलाफ अपने दिलोंमें कोओ गुस्सा या बुरी भावना न रखें, तो प्रार्थना करना मेरा फर्क हो जायगा । यह मुमकिन है कि मगर पूरी सभा अपने जिरादे और काममे अहिंसक हो जाय, तो भेतराज करनेवाला अपने मनपर काबू कर लेगा । मेरी राय अहिंसाका जैसा ही असर होता है । जिसके तिवा मेरी यह भी राय है कि सत्य और अहिंसा, थोडेसे बुद्धिमान लोगोंकी ही वपौती नहीं हैं। गाचरणके सारे आम नियम, जिन्हें भगवान के हुक्मोंके रूपमें जाना जाता है, नीघेसादे हैं । और अगर दिल्ली मिच्छा हो, तो झुन्हें आसानी से समझा जा सकता है और अनलने छाया जा सकता है । अिन्सानको सिर्फ अपने आलसकी वजहसे ही वे नियम मुश्किल जान पड़ते हैं । भिन्सान प्रगतिशील है। कुदरतमें कैसी कोसी चीज नहीं, जो हमेशा सेक्सी या स्थिर बनी रहती हो । सिर्फ भगवान ही स्थिर है। क्योंकि वह जैसा क्ल था, वैसा ही आन है और कलमी बैसा ही रहेगा, और फिर भी वह हमेशा क्रियाशील है । यहाँ हमें भगवानके गुणोंकी चर्चा नहीं करनी है । इन सो यह महसूल करना है कि हम हमेशा प्रगतिशील हैं । सिलिये मेरी राम है कि अगर सिन्मानको जिन्दा रहना है, तो झुसे ज्यादा ज्यादा सत्य और अहिंसाको अपनाते जाना होगा ! व्यवहारके जिन दो चुनियारी नियमोंको ध्यान में रखकर ही मुझे और आप लोगोंको काम करना 'और जीना है । १२८
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