रखा जाता है, लुसे अनाज पैदा करनेवाले हिमान नहीं ममजवे--- दे समज्ञ भी नहीं सस्ते । मिमलिने वे अपना aara, जिसकी कीमत सुन्हे खुले बाजार में ज्यादा मिल सकती है, ण्ट्रोलसे जितनी कम कीमतोंपर खुशीसे बेचना पसन्द नहीं करते । जिम सचाभीको आज सत्र कोभी जानते हैं । अनाज तंगी नामित करनेके लिये न तो आँकड़े किट्टे करनेकी नरूरत है और न बड़े पड़े देख और रिपो निकालना जरूरी है । हम आशा र हि कोणी जररत से ज्यादा हुभी आबारीका भूत हिसाकर हमे करायेगा नहीं । अनुभवी लोगोंकी सलाह चा हमारे मत्री जनता हैं और जनतामेंसे है । अन्हें सियारा घमण्ड नहीं करना चाहिये कि सुनन्त ज्ञान झुन अनुभवी लोगों ज्यादा है, जो मन्त्रियोंकी कुर्सियोंपर तो नहीं बैठे हैं, लेकिन यह mera fara है कि कण्ट्रोल जितनी जल्दी हाँ सुतना ही फायदा होगा ! भेक वैद्यने लिखा है कि अनाज कण्ट्रोलने सुन लोगोंके लि जो रेशनके अनाजपर निर्भर करते है, खाने बारह मनान और दाल पाना नामुमकिन बना दिया है । और, भिसलिये साला मनोन खानेवाले लोग गैरजरूरी तौरपर बॉनारियकि शिकार बनते हैं । लोकशाही और विश्वास आज जिन गोदामों में ट्रोलका सागला अनाज बेचा जाता है, इन्होंने सरकार आसानीसे अच्छा बेच सकती है, जो वह खुले बाजारमै खरीदेगी | असा करनेसे कीमत अपने आप ठीक हो जायेंगी और जो अनाज, दालें या dehat are wछपे पड़े है सब बाहर निकल आयेंगे ! क्या सरकार अनाव बेचने और पैदा करने- पालोका विश्वास नहीं करेगी ? अगर लोगोंको सनून कायदेको रवीले याँधकर भीमान्दार रहना सिखाया जायगा, तो लोकशाही टूट पड़ेगी । लोकशाही विश्वाचपर ही कायम रह सकती है। अगर लोग मालके कारण या मेक-दूसरे को धोखा देनेके कारण मरते हैं, तो सुनकी मौत स्वागत किया आय | फिर बचे हुमे लोग आलय, काहिली और चेरहमीभरी खुदगरजीके पापको नहीं दोहरायेंगे । १४०
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