५४ गुस्सेकी ग्रुपज 8-99-1810 प्रार्थना शुरू करनेके पहले गाधीजीने कहा, आज तो सिर्फ हमारे पुराने नभ्य मित्रने हो पुरानी आवत पढ़नेपर भेतराज गुठाया है । जिसलिये मे पंजाबी हिन्दू शरणार्थियोंके मेरु दर्दभरे सतकी चर्चा गा । न्होंने पत्राने बहुत कुछ सहा है। कुरानकी आयत पढनेश न्होंने विरोध किया है। में नहीं जानता कि वे भाभी यहाँ मोजूद है या नहीं। वे यहा हो या न हो, लेकिन मे स खतकी अपेक्षा नहीं कर सकता । वह गहरे दर्दसे लिखा गया है । भुसमें काफी अच्छी दलील दी गभी है। लेकिन वह अज्ञानसे भरा हुआ है, जो गुम्पेकी सुपज है । भुसकी हर लाभिनमें गुस्सा भरा हुआ हे | आजरल करीब कर नेरा बारा समय हिन्दू या सिक्ख शरणार्थियों या दिल्लीके दुखी मुसलमानोंकी दर्दभरी कहानियाँ सुननेम ही जाता है । मेरी आत्माको मी भुतना ही दुख और सुतनी ही चोट पहुँचती है। लेकिन अगर मे गेने लगूं और सुवास धन जाखूं, तो वह अहिंसाका सच्चा रप नहीं होगा | अगर मैं अहिंसासे भितना कोमल वन जायें, तो दिनरात रोता ही रहूँ और मुझे औरषरको सुपासना करने, खाने-पीने श्री मोनेका भी समय न मिले। लेकिन मैने तो बचपन से ही अहिंसक होनेके नाते दुखायो देख-सुनकर रोनेकी नहीं, बल्कि दिलको कठोर बना लेनेकी आदत डाल ली है, ताकि मे वु खोंका मुकाबला कर सकूँ । क्या पुराने ऋषिमुनियोंने हमे यह नहीं यताया है कि जो आदमी अहिंसास पुजारी है क्षुसका दिल फूलसे भी कोमल और पेत्यरसे भी कठोर होना चाहिये मैंने मिस झुपदेशके मुताचिक बीनेकी कोशिश की है । जिसलिये जब मिस खतकी शिकायतों जैसी शिकायतें मेरे पास आती हैं, या जब में अपने मुलाकातियोंके मुँहसे गुस्से और रंजसे मरी १४१
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