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पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/१७२

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या दस्तकारी, औसत हरिजनको ज्यादा योग्य और होशियार पाया है। में यह नहीं कहना चाहता कि हरिजनों कोभी चुराभियाँ नहीं होतीं, लेकिन वे तो हर वर्ग के लोगोंमें पाभी जाती है। फिर भी, मे यह तो कहना चाहूँगा कि कुमाहूतकी कड़ी पाबन्दियोंके बावजूद अगर हरिजनों को दूसरोंकी तरह सुन्नतिका मौका दिया जाय, तो वे भौरों-जैसे ही जागे बक सकते हैं। दूसरी खुशी की बात यह है कि पण्डरपुरका पुराना और मगहर मंदिर ठीक न्हीं तोंपर हरिवनोंके लिये खोल दिया गया है, जैसा कि दूसरे हिन्दुओंके लिये । भिसका जास श्रेय श्री माने गुरुजीको है, जिन्होंने सुले हरिजनोंके लिये हमेनाके वास्ते सुलवानेके मकसद से आमरण पवार शुरू किया था। मै मन्दिरके ट्रस्टियों और पण्डरपुरकी व आसपासकी जनताले भिस नहीं कदनके लिये बवामी देता हूँ ! मुझे आशा है कि कुमाहूतकी आखिरी निशानी भी जल्दी ही गये जमानेकी चीन यन जायगी । मात्र हिन्दुस्तानके दोनों हिस्तोम जो साम्प्रदायिक जहर फैला हुआ है सुखे मारनेमें वह कदम बहुत मदद करेगा | शाकाहार कैसे फैलाया जाय ? जमके बाद गाधीजीने डासे आनेवाले कभी सवालोंके जare दिये । सुन्होंने कहा, येक मुसलमान दोस्तने यह शिकायत की है कि यूनियन के जिस हिस्सेने ने रहते हैं, वहाँ शाकाहारी हिन्दू अपने पीत्र रहनेवाले मुसलमामोंपर यह बोर डालते है कि वे मछली और गोश्त भी न खायें । कैसी गैरस्वादारी और अनुदारताको में पसन्द नहीं करता । धार्मिक विव्वाससे अन्न और शाकमाना खानेवाले लोगों की तादाद हिन्दुस्ताननं बहुत कम बताओ जाती है। हिन्दुस्तानमे हिन्दुओं की बहुत पढी ताक असी है जो मौका मिलनेपर मछली और परिन्दों या जानवरोंका गोस्त जानेमे नहीं हिचकिचावी । शाकाहारी हिन्दुओंको मुसलमानोंपर अपना धार्मिक विश्वास लादनेका क्या हक है ? अपने मासाहारी हिन्दू दोस्तोंपर तो ये अपना विश्वास लादनेकी हिम्मत नहीं करेंगे । यह सब मुझे हॅसकी बात मादल होती है । शाकाहारको फैलाने का सही रास्ता यह है कि जैसे लोग मास-मछली खानेवालोंको १४७