सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/१७४

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

वर्षा थी । खत लिखनेवाले भाभीने आगे कहा है- 'सुन लोगोंको तो आपने अहिलाकी सीख देनेकी हिम्मत की, लेकिन जब काग्रेस सरकार में आपके दोस्त अहिंसाको छोड़ते और काईमीरको हथियारबन्द फौजकी मदद भेजते हैं, तब आपकी अहिंसा कहाँ चली जाती है। मुन्हें भी आप अहिंसाका सुपदेश क्यों नहीं देते ?' अपने खतके अन्तमें सुन भाभीने मुझसे जिस बातका निश्चित जवाब मांगा हैं कि काश्मीरी लोग हमलावरोंका अहिंसाले कैसे सामना कर सकते हैं। जिन भाऊने अपने खतमे जो अज्ञान बताया है सुसपर मुझे अफसोस होता है । आप लोगोंको बाद होगा कि मैंने बार बार यह बात कही हैं कि भिस मामले में यूनियन केविनेटके अपने दोस्तोंपर मेरा कोजी असर नहीं है। मैं खुद तो अहिंसाके अपने विचारोंपर हमेशा की तरह आज भी डटा हुआ हूँ, लेकिन में कैबिनेटके अपने घसेसे वडे दोस्तोंपर भी अपने से विचार लाइ नहीं सकता । में झुनसे यह आशा नही कर सकता कि वे अपने विश्वास के खिलाफ काम करें। जब मैं यह कबूल करता हूँ कि अपने दोस्तोपर मेरा पहले जैसा काबू नहीं रहा, तो हर भेकको सन्तोष हो जाना चाहिये । फिर भी खत लिखनेवाले भाओका सवाल वा मौजू है । मेरा अपना जवाब तो बिलकुल सादा है । योग्य आदमी की तारीफ करनी ही चाहिये मेरी अहिंसाका तकाजा है कि मुझे योग्य आदमीकी तारीफ़ करनी ही चाहिये, फिर भले वह हिंसा में विश्वास करनेवाला ही क्यों न हो । मैने श्री सुभाष बोसकी हिंसाको कमी पसन्द नहीं किया, फिर भी में झुनकी देशभक्ति, सुसवूस और बहादुरकी तारीफ किये बिना नही रहा । भिसी तरह, हालों कि मै मिस बातको पसन्द नहीं करता कि यूनियन सरकार काश्मीरियोंकी मदद करनेमें हथियारोंका मिस्तेमाल करे और हालाँकि मे शेख अब्दुल्ला के हथियारोंका सहारा लेकी वातको ठीक नहीं मान सकता, फिर भी दोनोंकी सूझबूझ और तारीफके लायक कामेकी तारीफ किये बिना नहीं रह सकता। खासकर अगर मवद करनेवाली दुकरियों और काश्मीरकी रक्षा-सेनाका ये मेक आदमी १४९