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पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/२००

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६५ राष्ट्रका पिता ? १५-११-१४७ अपना भाषण शुरू करते हुये गाधीजीने कहा कि मैं मानता हूँ कि आप लोग स्वभावत यह झुम्मीद करेंगे कि दोपहरको मे० आभी० सी०सी० की बैठकमै मैने जो कुछ कहा है, वह आप लोगोंको बतलाओं । मगर मेरी सुसे दोहरानेकी अिच्छा नहीं होती। दरअसल मैने वहाँपर वही बात कही थी जो मैं आप लोगोंको भितने दिनोंसे कहता आ रहा हूँ। अगर मुझे पूरी ओमानदारीले राष्ट्रका पिता कहा जाता है, तो वह सिर्फ जिसी अर्थ सन्द है कि सन् १९१५ में मेरे दक्षिण अफ्रीकासे लौटनेके बाद काप्रेसका जो स्वरुप बना मतलब यह है कि देवपर मेरा असरका दावा नहीं कर सकता । कम षह होनी नहीं चाहिये। सबको सिर्फ अपना फर्ज अदा करना चाहिये सके बनाने में मेरा वग हाथ था। भिसका यदा असर था। मगर माज में जैसे जिससे मुझे चिन्ता नहीं है— कमसे नदीनेको भगवानके हाथोंमें छोर देना चाहिये । भगवानकी मर्जी बगैर कुछ भी नहीं होता । हमारा फर्ज सिर्फ कोशिश करना है। मिसलिमे मे सो ये० आसी० सी० सी०की बैठक जिस फर्कको ध्यान में रखकर गया था कि अगर बैठककी कार्रवाओं शुरू होनेसे पहले मेम्बरोंसे कुछ कहनेको मुझे जिनानत मिल गभी, तो मैं लुनके सामने वह बात रख दूंगा जिसे में सच मानता हूँ । कण्ट्रोल नुकसानदेह हैं आप लोगोसे में कण्ट्रोलके बारेमें कुछ कहना चाहता हूँ। क्योंकि मै ओ० आ० सी० सी० की बैठक में मौजूदा अहमियत रखनेवाले दूसरे मामलोंपर ज्यादा देर तक गेला, मिसलिमे कण्ट्रोल के बारेमें सिर्फ भिक्षारा भर कर सका । १२ १७७