सुन्होंने कहा कि सुख छाननीकी तारीफके लायक सफाभी को देखकर मुझे खुशी हुआ । वहाँपर जगह जगह यात्रियोंके लिये धर्मशाला में बनी हैं, जो मेलोंके वक्त वहाँ जाते हैं। वे मेले मेक निश्चित समयके बाद वहाँ भरते रहते हैं । ये धर्मशाला में अन धरणार्थियोंके काममें लाभी जाती हैं । वहाँ पानीकी कुछ दिक्कत है जिसे अधिकारी लोग दूर करनेकी कोशिश कर रहे हैं। जिसमें मुझे कोभी शक नहीं कि भाज वहाँ जितने शरणार्थी हैं सुनसे कहीं ज्यादा गरणार्थियोंको - अगर पानी पुरानेकी गारण्टी दी जा सके – झुस जगहमे आसरा दिया जा सकता है । अफसरोंके बारेमें गाधीजींने कहा, जब मे शरणार्थियोंके बारेमें बोल रहा हूँ, तब कुछ जैसे दोपोंके बारेमें सुनका ध्यान खीचना चाहूँगा जो मुझे घताये गये हैं। मुझसे यह कहा गया है कि शरणार्थियोंमें आपस में ही काला बाजार चल रहा है। जिन अफसरोंके जिम्मे शरणार्थियोंकी देखभालका काम है, वे भी दोषी बताये जाते हैं । मुझसे कहा गया है कि जिन अफसरोंके हाथमें छावनियोंका भिन्तनाम है, इन्हें घूँस दिये बिना वहाँ जगह पाना मुमकिन नहीं है। दूसरी तरहसे भी सुनका वरताव दोषसे परे नहीं माना जाता । यह ठीक है कि सभी अफसर दोपी नहीं हो सकते, लेकिन अक पापी सारी नायको डुबो देता है । शरणार्थियोंकी वददियानती जिसके बाद मुझसे कहा गया है कि शरणार्थी लोग छोटीमोटी चोरियाँ भी करते हैं। में झुलसे पूरी श्रीमानदारी और खरे बरतावकी आगा रखता हूँ । मुझे यह रिपोर्ट दी गयी है कि शरणार्थियों को आदेसे बचनेके लिये जो रजाभियों दी जाती है झुनमेसे कुछ सुधेड़ वाली जाती हैं, झुनकी सभी फेंक दी जाती है और छींटके कमीज वगैरा बना लिये जाते हैं। मुझे जिसी तरह की दूसरी बहुतसी बातें बत्तामी गभी हैं, लेकिन मे शरणार्थियोंके सारे बुरे कामका वर्णन करके आपका वक्त १९५
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