७१ हिन्दुस्तानकी डेमरियाँ २१-११-४० आज शामकी प्रार्थनाके बाद, देशनें गोरक्षा और गोपालनके वाला जिक्र करते हुये गाधीजीने का कि जब मै आप लोगोंके सानने अपना माप दे रहा हूँ, तब शायद जिल गोशाला के दारेनें मैंने कल मामको आपसे कुछ कहा था हो रहा है । मैं केर बात कहना ! का चालाना जलसा अभी चाहूँगा । फल शानके अपने भाषण नै फोजियोंके लिये हिन्दुस्तान में चला वानेवाली विभिन्न डेमरिया जिन नहीं किया था। डॉ० राजेन्द्रप्रसादने मुझे बतलावा है कि वे बेमायाँ अभी भी चल रही हैं। बरसों पहले मैं बगलोरकी सेण्ट्रल हेअरी देखने गया था । तब कर्नल लियकी देखरेखन वह चल रही थी । मैंने वहाँ कुछ सुन्दर ठोर देखे थे। सुनने मेक अिनान पाओ हुआ गाय थी। वे लोग मानते थे कि मेणियाभरमें वह सहते अच्छी गाव है । वह ७५ फेंड दूध हर रोज देती थी या अंक ही पारने भितना दूध देती थी, वह मुझे ठीक बाद नहीं है । वह गाय चिना किसी रोकटोक वाहे जहाँ धूमफिर चम्ती यो सुनके लिये जहाँ- नहीं चारा रखा रहता था, जिसे वह चाहे तत्र वा सक्ती थी । यह जिस तसवीरका अच्छा पहलू है । बछड़ोंका वध दूतरा पद मैंने नहीं देखा, नगर से प्रामाणिक सौरपर कहा गया है कि बहुतसे नर बोको नार डाला जाता है, क्योंकि सुन सबकी बोझ दोन डायल नहीं बनाया जा चत्ता । ये डेमरियाँ, बहुत ज्यादा नहीं, तो बैंकों अॅक्ट नमीन घेरे हुये हैं। ये सब खास तौरपर यूरोपियन निपाहियाके लिये हैं। जिने कमी करो रुपया लगा है । अब चूंकि ब्रिटिश चित्राही हिन्दुस्ताननें नहीं हैं, असल में मिनी ૨૮
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