७५ शरणार्थी या दुःखी ! २५-११-१७७ , कल मुझे भेक भाभीने कहा, हमें शरणार्थी क्यों कहते हैं । हमें पाकिस्तान सफरर ' कहिये । यूनियन हमारा देश नहीं है क्या फिर हम शरणार्थी क्यों कहलायें । ओक तरहसे सुनकी यह बात ठीक है । योंको तकलीफ होती है तो ये माँकी गोदमें आकर छिप जाते हैं । यूनियन सबका मुल्क है। सारे हिन्दुस्तानके रहनेवाले 'भाभीभामी हैं। सो वे लोग हमसे यूनियनमे आते हैं । अग्रेजीमें रेफ्युजी' शब्द जिस्तेमाल हुमा । खुसका तरजुमा अस्त्रवारवालोंने शरणार्थी किया । सफरर भी अग्रेजी शब्द है। तो मे न्हें सुखी कहूँगा । वैसे तो हम सब हु रखी है । पर सच्चे दुखी आज वे है, जो लाखोंकी तादादमै अपने घरबारसे सुखद चुके हैं। आज मैं सुन दु स्त्रियोंकी पात करना चाहता हूँ । , मुसलमानों वरोंपर कब्जा न किया जाय मेरे पास आज दिनमें चाहोरका भेक कुटुम्ब माया । वहाँ झुनका घर, व्यापार, धन-दौलत सब छूट गया है। मुझे वे लोग कहने लगे, घर दिलवा दो। मैने कहा, में हुकूमत नहीं हूँ । घर देना-दिलवाना, अगर होता तो भी में नहीं दिलवाता । दिल्लीमें मेरे में नहीं है । खाली घर हैं कहाँ ? लोगोंके अपने घर भी हुकूमत खाली करना लेती है । बाहरसे मितने मेलची आते हैं, लुनके लिये घर चाहिये । हुकूमत चाहे तो यह घर, जिसमें में रहता हूँ, खाली करवा सकती है । भगर हुकूमत वहाँ तक नहीं जाती । इन्होंने कहा कि सुनके घरके १७ आदमी भी मारे गये थे। मैंने कहा कि सारा हिन्दुस्तान अगर हमारा कुटुम्व है, तो जहाँ हजारों लाखों मरे वहाँ १७ की क्या गिनती है ? २१३
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