८१ कभी मिन नाराज होते है 9-17-80 'अगर 'का मिस्तेमाल क्यों करते है ? "अगर यह महाँ है तो " 32 लेना चाहिये मैंने "अगर " मसुम समय रें चर्चा यामाके क्रर क्यों को भी निवेदन ररता हूँ। मुझे पहले तय कि बात नहीं है या नहीं। मैं मानता है कि जय जय या नहीं। किस्तेमाल किया है, मैने कुछ हावने बा, ते फायदा ही हुआ है। बारेमें है। मित्र लोग रहते हैं कि मैंने राठियावादके वारे मतमानोपर ज्यादतियोंके झूठे वयानको मनहरी है। बत्तर मिलनान सरासर झूठे थे। जो थोड़ी बहुत गरम हुमी भी, झुसे फौरन का टा गया। लेकिन मेरे " अगर ' के साथ न मिलनानोरा जिला करनेते सामीको कोमी तुस्मान नहीं पहुँचा । काठियावा साधी और प्रेस जिस हद तक मचाभीपर सो रहे हैं, सुतना ही अन्हें फायदा हुआ है । मगर मित्र लोग कहते हैं. भिसने कोभी ग्रह नहीं कि सचाओं आखिरने जाहिर होकर रहती है, मगर झुससे पहले जुम्मान तो हो ही जाता है । जिन्हें सकी कुछ पट्टी " अगर " को तो छोड़ देते हैं और मेरे करनेके लिये पेश करते हैं। जिस तरह झूठ जिम तरहकी चालवाजीसे आगाह हूँ। जब जब जिम तरह की चालाकी खेलनेकी कोशिश की गयी है, वह निष्फल हुआ है । और ला करनेवाले बेसीमान लोग जनतामें झूठे साबित हुये हैं। मे "अगर कइ+र जिन मिलजामा निक करता हूँ, झुनसे कितीको महरानेकी जरूरत नहीं । शर्त सिर्फ यह है कि जिनपर मिकमान लगाया जाता है, वे सचमुच मिलनानसे सर्वथा मुक्त हो । १३० नहीं, अंते बेजीमान लोग को अपनी बात वि फैलाया जाता है । 27
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