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पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/२६२

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मगर विजयलक्ष्मी पण्डित जो नहीं कह पार्थी, सुना दूँ । अन्याय कहनेका सुवर्ण पाय मैंने दक्षिण वह मैं आपको अफ्रीका में ही हैंडा था । मान लीजिये कि हम यू० अन० ओ० में जीत जाते और जनरल स्मट्स दक्षिण अफ्रीका के हिन्दुस्तानियोंकी सारी मांगें मंजूर कर लेवे, लेकिन वहाँ रहनेवाले गोरे नहीं मानते, तो हम क्या कर सकते थे ? आजकल हमारे ही देशमे जैसी यातें हो रही हैं। पाकिस्तान से हिन्दुओंको और हिन्दुस्तान से मुसलमानोंको भगाया जा रहा है। चन्तुमें अभी भी बहुतसे हिन्दू और विक्स हैं। दूसरी जगहोंपर भी थोड़े-बहुत प हैं। वे यहाँ बाहर नहीं निकल सकते । निकले, तो भरना होगा, भीतर रहे, वो खाना नहीं मिलता । मैने यहाँके मुसलमानोंसे कहा कि सच्ची हार आप खुद ही खा सकते हैं । दूसरा कोभी आपको नहीं खिला सकता 1, आप साफ कह दें कि हम तो यहीं रहेंगे। यहीं पैदा हुने, यहीं बडे हुने, यहीं रहेंगे — और भिज्जतके साथ रहेंगे । वह चीन सरपर लागू होती है । - दक्षिण भनेका हरिशयोंका शुल्क है । वहाँ वाहरसे गये हुमे ओोबर लोगोको यहासे गये हुये हिन्दुस्तानियोंसे ज्यादा हक नहीं हैं । नगर यूरोपियनोंने हञ्जियोंको दवा दिया और दक्षिण अफ्रीका में रहनेवाले हिन्दुस्तानियोंसे सुनके बुनियादी इक छुड़ा लिये । हिन्दुस्तानका मामला यू० मैन० ओ० के सामने रखना बिलकुल ठीक है । मगर यदि यू० अन० ओ० दक्षिण अमकाके हिन्दुस्तानियोंको मिन्साफ नहीं देता भा नहीं दे सकता, तो क्या सुन्हें अपने हकोंके लिये लग्ना नहीं चाहिये ? मेरी राय मुन्हें लडना चाहिये मगर हथियारोंके जोरसे नहीं । सच्चा और भेकमात्र हथियार सत्याग्रह या आत्मवलका है। आत्मा अमर है । शरीर नाशवान है । अगर दक्षिण अफ्रीका के हिन्दुस्तानियोंमें हिम्मत और अपनी अिज्जतका खयाल है, तो वे आत्मक्लके सहारे अपने बुनियादी इकोंके लिये लड़ेंगे । I २३९