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पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/२६८

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फण्ट्रोल भाजकल गात चल रही है कि रूपदेका और खुराकका अकुश छूट जानेवाला है । सब कहते हैं, अच्छा है: जल्दी छूटे । मगर छूटनेपर हमारा फर्ज क्या होगा ? व्यापारियोंका फर्ज क्या होगा ? अकुश छूटनेपर सब कुछ सुनके हाथोंमें रहेगा । तो क्या वे लोगों को लूटना शुरू कर देने अगर अकुश छूटता है, तो खुसमें मेरा भी हाथ है। मैंने जितना प्रचार किया है। मगर मे भितना भी कहूँ कि हुकूमतको जो चीज नहीं जैचती, मुझे हुकूमत कर नहीं सकतीं। मैं चाहता नहीं कि वह भैसा करे । में तो सर्क कर लेता हूँ कि आज अगर १० मन अन्न है, तो अकुश लुठनेपर २० मन हो जायगा । जिसे लोग दवाकर बैठ गये हैं, वह सब बाहर आ जायगा । आज किसानोंको पूरे दाम नहीं मिलते हैं, जिसलिमे वे अन्न नहीं निकालते । सरकार जबरदस्तीसे निकाल सकती हैं, निकाल रही है। व्यापारी लोग पुरानी हुकूमतमें मनमाने दाम लेते थे। लोगोंकी हते थे । अनन्हें भेक कोदी भी जिस तरह देना पाप समझना चाहिये। मुझे आशा है कि किसान अन्न बाहर निकाऐंगे और व्यापारी शुद्ध कौड़ी कमायेंगे। तब सबको खाना कपडा मिल जायगा । अगर कुछ कमी रहेगी, तो लोग अपने आप कम हिस्सा लेंगे। मे यह नहीं चाहता कि अकुश ठसे लोग भूखों मरने लगें । अगर लोग अपना फर्ज नहीं समझते, खुद अपनेपर अकुण नहीं ख्याते, तो हमारी हुकूमतको हट जाना होगा । व्यापारी मगर अपना ही पेट भरें, दूसरोंको मरने दें, तब हमारी हुकूमत रहकर क्या करे ? क्या वह नफाखोरोंको गोलीसे जुड़ा दे ? असी ताक्त हमारे पास है नहीं। हमारी ३०-४० सालकी तालीम जिससे सुलटी रही है। गोली चलाकर राज्य चल नहीं सकता । वह राज्य खोनेका रास्ता है | आशा तो यह है कि अंकुश झुठानेपर लोग साफ दिलसे हुकूमत की सेवा करेंगे । हुकूमत सब कुछ खुद ही करना चाहे, तो वह कर नहीं सकती । वह पंचायत- राज न होगा, रामराज्य नहीं होगा ! लोग खुद अपनेपर अकुश रखें, साकि हुकूमत और सिविल सर्विसवाले कहें कि अण झुठाया, तो अच्छा ही हुआ । आज तो सिविल सर्विनवाले कहते हैं कि गाधी क्या समझे ? २४५ 1