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पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/२७०

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८६ सच्चे पड़ोसी बनने की शर्त ६-१२-४७ आपने सुब्बालक्ष्मी वहनका भजन और धुन सुनी। सुनका स्वर बहुत मीठा है। प्रार्थना और रामधुन हरकको राममें खो जाना चाहिये । मैंने आपसे कहा था कि मे १५ मिनटसे ज्यादा नहीं बोलूँगा । मगर मुझे पता चला कि कल ही २५ मिनट हो गये थे। वह मेरे लिओ शरमकी बात है । फलका भेक खत मेरे पास है । समें ये भाभीने लिखा है कि मैं तो भोलाभाला हूँ । दुनिया मुझे धोखा देती है । मुझे नह भाजी सावधान करते हैं कि 'पाकिस्तान में कितना जुल्म हुआ है। हमारे यहाँ तो हिन्दुओं और सिक्खोंने सिर्फ बदला लिया है । हम कुछ भी न करें, तो भी पाकिस्तानके लोग भले बननेवाले नहीं । हमारे मकान गये, जायदाद गभी। वह सब थोड़े वापस आनेवाले है लेकिन मैं यह नहीं मानता। छोटे-बड़े सबको मकान जानेका समान दुख होता है करोड़पत्तिको अपना महूल जितना atest अपनी झोंपड़ी प्यारी है। मे तो तब प्यारा है, श्रुतनी ही तक चैनसे नहीं बैठ सकता, जब तक सेक नेक हिन्दू और सिक्ख भिज्जत व सलामतीके साथ अपने घर नहीं पहुँच जाता । जो मर गये, सो मर गये । जो 1 मकान जल गये, सो तो जल गये । कोमी हुकूमत सुन्हें वैसेके वैसे 'बनवाकर वापस नहीं दे सकती। जो कुछ यच रहा है, वहीं कोटा दिया आय, तो काफी है। काहोर में, कायलपुर में और पाकिस्तानकी दूसरी जगहोंमें हिन्दुओं और सिक्खोंके मकानों और अमीनोंपर मुसलमान कब्जा करके बैठ गये हैं, सुन्हें खाली करना ही होगा । अगर यूनियनमें हम शरीफ बन जायें, तो पाकिस्तानको भी शरीफ बनना ही होगा । वहाँवाले अपनी नाक कटाक्