है । दूसरा मकान हँटने कहाँ जायूँ ? अच्छा तो यह होगा कि हम सव मिट्टी में रहे। मगर झुन्हे तैयार करना भी आज तो आनान काम नहीं है । तो असी गप झुटानेके पहले अखवारवालोने सरदार माहयसे या मुझसे पूछ क्यों न लिया ख़नसे बदतर भेक निधी माओ लिलते हैं कि जिन सिंधी डॉक्टरने कुछ दिन पहले विके हरिजनों की तकलीफों के बारेमें मुझे लिखा था, और जिसका जिन मैंने प्रार्थना सभा में किया था, इन्हे पकड लिया गया है। हरिजनों के दूसरे बहुत सेवकोंको भी पकड़ लिया गया है। वहीं खून नहीं होते, मगर यह मध खुनने बदतर है । जिस तरह लोगोंको पकडना और परेशान करके मारना बहुत बुरा है। पाकिस्तानकी हुकूमतको में सावधान करना चाहता हूँ कि अती ही बातें चलती रही, तो वहाँ कार्यकर्ता कव तक रह सकते हैं? मैं चुनता हूँ कि जो लोग हरिजनों को मदद दे सकते हैं, उन्हें वहाँ हाकिम अपने यहाँ रहने ही नहीं देना चाहते। कस्तूरचा ट्रस्टकी बहनोंसे गाँवोंकी स्त्रियों और अग में कस्तूरवा ट्रस्टकी बहनोंके साथ मेरी जो बातें शुभ, सुन्हें सुना हूँ। कस्तूरबा-निधिका हेतु है सात लाख बन्दोंकी सेवा। हजारों औरतें भगाभी गभी है। और सिक्ख औरतें और दूसरी तरफसे अक तरफसे हिन्दू मुसलमान औरतें। किसने ज्यादा कम-से-कम यारह बारह हजार कस्तूरबा सघ जिस बारेमें क्या भगार्थी, यह सवाल छोड दिया जाय। लड़कियाँ दोनों तरफके लोग ले गये हैं। कर सकता है 2 सथको नामके लिये कुछ नहीं करना है। सुसे जो कुछ करना है, कामके ही लिये करना है। सबकी करीब करीब सव सेविकायें महरसे भाभी हैं। मयोगसे कोमी कोभी बहनें देहातसे मिली भी हैं तो अती जिनका शहरांने स्पर्श किया है। आज तो भैंसा सिलसिला धन गया है कि गाँवोंसे कच्चा माल काकर शहरोंगे बेचा जाता है और करोड़ों रुपये पैदा किये जाते है। देहातवालोंकी जेवमें बहुत थोडा पैसा जाता है। बाकी सब महरके पैसेदार लोगोंकी जेवोंमें जाता है, मानो २५५
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