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पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/२९४

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कारोबार फिरसे चलानेकी माशासे वापस आ रहे हैं। मगर शुनकी दूकानें कौरा वापस करनेसे पहले सुनसे जैसी नामुमकिन शर्तो पर दस्तखत कराये जाते हैं कि कभी निराश होकर वापस चले गये हैं । फिरसे बतानेवाला कमिश्नर अिन शतॉपर दूकानें खोल देता है १ बिक्रीका पूरा हिसाब रखा जाय । २ विना मिजाजत मालिक कुछ भी माल या रुपया दूसरी जगह म हे जाय ।

  • ३. अपनी दूकानको चालू धन्धा रखनेका वचन दे ।

४ चिकसे जितनी कमाभी हो, वह रोजकी रोज बैक् जमा की जाय, बिना अिजाजत शुसमें कुछ भी निकाला न जाय । ५ दूकानदार कायमी तौरपर लाहोर में ही रहेंगे । " मुसलमानोंपर भैसी कोमी शर्त नहीं है, तो हिन्दुऑपर क्यों हिन्दू कहते है कि जिन गतका वे पालन न कर सकेंगे, सो निराश होकर वापस चले जाते है । " furerera विश्वास पैदा होता है I तो निराशाकी का तो मे पहले ही कर चुका हूँ। यह खबर सही हो, तो भी जरूरी नहीं कि सुन मुसलमान भाभियोंने मुझसे जो कहा, वह सर्वथा रह हो जाता है। मुन्हें न सिर्फ अपना नाम रखना है, बल्कि यूनियनमें वे जिनके नुमामिन्दा है सुनका और पाकिस्तानका भी, जिसने इन्हें यह सब आश्वासन दिया, नाम रखना है । मैं यह भी कह दूँ कि वे भाभी मुझसे मिलते रहते हैं। आज भी वे आये थे । मगर मेरा मन था और मैं अपनी प्रार्थनाका भाषण लिख रहा था, झिसलिये झुनसे मिल न सका । सुन्होंने मुझे संदेश भेजा है कि वे निकम्मे नहीं बैठे रहे । मिस मिशनका काम कर रहे हैं । पत्र लिखनेवाले मामीको मेरी सलाह है कि जरूरतसे ज्यादा शक न करें और बहुत ज्यादा नाजुकवदन न बनें 1 विश्वास रखनेसे वे कुछ खोनेवाले नहीं हैं। अविश्वास आदमीको खा जाता है । वे सँभलकर चलें । मेरी तरफसे तो मितना ही कहना है कि मैंने जो कुछ किया है, लुसका मुझे अफसोस ।