९७ जबरदस्ती से कब्जा १७-१२-१४७ अक भाभी, जो सियालकोटमे रहते थे, लिखते है कि पहले तो पंजाच भेक था, सो सुनका मकान पूर्व पंजाव या और यह व्यापार पश्चिम eaten करते थे । पश्चिम पंजाब सुन्हें भागना पड़ा । पूर्व पजाव आक्ट देखा कि शुनके मकानमै सरकारी अमलदार रहते हैं । सुन्होंने बहुत कोशिश की कि मकान खाली हो जाय, पर यह हो न सका । सुन्हें अपने घरमे सिर्फ दो कमरे रहने को मिले। वह पूछते है— क्या हुकुमतको सुनका मकान खाली करवाने में सुनकी मदद नहीं करनी चाहिये ? क्या यह अच्छा होगा कि जिसके लिये मुन्हें कोर्ट में जाना पडे ? मैं मानता हूँ कि हुकूमतको झुनका मकान खाली करवाने में झुनकी मदद करनी चाहिये, ताकि सुन्हें कोर्ट जाने की जरूरत न पड़े । मकानमें रहनेवाले भाभी सरकारी अमलदार है, जिसलिये मुनका मकान वाली करवामा भरकारके लिये आसान होना चाहिये । यहाँ भी दुखी लोग मकानोंका कब्जा के बैठे हैं। ताला भी तोड देते है। मकान- मालिक अपने मकान में रहना चाहे, तब कोभी सरकारी अमलदार खुसमें कैसे रह सकते हैं? शरणार्थी मनमें आवे वैसा करने बैठ जाते हैं । और, अगर वह मकान मुसलमानका हुआ, तब तो कहना ही क्या लेकिन जैसा करके वे न अपना भला करते हैं, न हिन्दुस्तानका 1 चोरी, चटमार वगेरा करके क्या कमी किसीका मला हो सकता है ? मीठी बातें लोग मुझे रोज सुनाते हैं कि पाकिस्तानवाळे मीठी बातें भले करें, मगर वहाँ को भी हिन्दू या सिक्ख भिज्जत आवरूके साथ नहीं रह सकता । अगर जैसा ही सिलसिला चलता रहा, तो पाकिस्तान में कोजी हिन्दू-सिक्ख नहीं रह जायगा । आखिर में मुसलमान आपस ૨૨
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