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पृष्ठ:Gandhi - Delhi Diary (Hindi).pdf/३०५

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श्रीसाभी या कुरानको माननेवाले मुसलमान कहें कि हम ही महले- किताब हैं, तो यह बात गलत है । सम धर्म भलाभ सिखाते हैं, वराभी और दुश्मनी नहीं । १९ जसरा गांव का दौरा १९-१२-२०० आज मै गुडगाँवकी तरफ गया था । 1 वहाँपर मेव लोग पहे हैं । कुछ अलबरसे जबरन भगाये गये हैं, कुछ भरतपुरसे । सुनकी मस्जिदें वगैरा डा दी गभी हैं। डॉ० गोपीचन्द भार्गव भी मेरे साथ गये थे । सुन लोगोंने अपनी कहानी सुनाभी। हिन्दू भी फाफी थे । देखनेमें भैसा लगता था कि जिनमें कुछ वैमनस्य है ही नहीं । मगर वह है । मेव लड़ाके होते हैं । मगर अब डर गये हैं। कभी पाकिस्तान चले गये हैं । कभी मिस्र सोचमें है कि इन्हें जाना चाहिये या रहना चाहिये। डॉ० गोपीचन्दने अन्हें सुना दिया कि जो रहना चाहते हैं, वे जरूर रह सकते हैं । जहाँ तक मैं समझता हूँ और जिन्दा हूँ, मुझसे तो यह बर्दास्त ही नहीं होनेवाला है कि लाखों लोग अपना घर छोड़कर वैधर बने रहें । लाखोंको दोनों तरफसे घर छोड़कर भागना पड़ा, यह वहशियाना बात थी । किसने शुरू किया, किसने ज्यादा किया, मिसका बयाल छोड़ दें, नहीं तो दुश्मनी मिट ही नहीं सकती । मजबूरीसे किसीको भागना न पड़े, मितना ही आपको देखना है । जो डर गये हैं और जाना चाहते हैं, वे भन्ने जायें। वहाँ कभी बहनें भी थीं। किसीके पास तम्बू है, तो किसीके पास नहीं । वे वापस तो तभी जा सकते है, जब अलपर और भरतपुरके लोग मुन्हें बुला लें। कभी लोग कहते हैं कि मेत्र लोग तो गुनाह करनेवाले हैं। अगर भैसा भी हो, तो क्या गुनाह करनेवालोंको मार डालेंगे ? सीधा रास्ता तो उन्हें सुधारना और शराफत सिखाना है । ૩૮૨