१४७ मुर्दोंका शहर- आजकी सभा में कर्फ्यूके कारण कम लोग आये थे, फिर भी गावीजी मारी दिल्लीके लिये घोले थे । सुन्होंने कहा, जब मे शहादरा 2 पहुँचा, तो मैंने अपने स्वागतके लिये आये हुये सरदार पटेल, राजकुमारी और दूसरे लोगोंको देखा । लेकिन मुझे सरदारके ओठोंपर हमेशा मुस्कराहट नहीं दिखाओ बी । सुनका मसखरापन भी गायब या । रेलसे भुतरकर में जिन पुलिसवालो और जनता से मिला सुनके चेहरोंपर भी सरदार पटेलकी खुदासी दिखाओ दे रही थी । क्या हमेशा खुश दिखाओ देनेवाली दिल्ली आज अकदम मुर्दों का शहर बन गभी है दूसरा अचरज भी मुझे देखना वदा था । जिस मंगी- वस्तीने ठहरनेमें मुझे आनन्द होता था, वहाँ न के जाकर मुझे विला आलीशान महलमै ले जाया गया । जिसका कारण जानकर मुझे दुख हुआ। फिर भी खुस घरमें पहुँचकर मुझे खुशी हुआ, जहाँ मे पहले अक्सर ठहरा करता था। मे भंगी वस्तीके वाल्मीकि भाभियोंके बीच ठहरूँ, या बिला- भवन मे उहरूँ, दोनों जगह मे बिड़ला भाभियोंका ही मेहमान बनता हूँ । लुनके आदमी भंगी वस्तीमे भी पूरी लगनके माथ मेरी देखभाल करते हैं। जिस फेरवदलका कारण सरदार नहीं हैं। वह बाल्मीकि बस्तीने मेरी हिफाजत के बारेमें किसी तरह डरनेकी कमजोरी कमी नहीं दिखा सकते । भगियोंके बीच रहकर मुझे बडी खुशी होती है, दालों कि नभी दिल्लीकी कमेटीके कसूरसे मे खुन घरोंमे तो नहीं रह सकता, जिनमें भंगी लोग मछलियोंकी तरह अक साथ हॅूल दिये जाते हैं । العالم
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